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'बूंदी बंधेज' कला के जरिए राजस्थान की अंजू कंवर महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर

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'बूंदी बंधेज' कला के जरिए राजस्थान की अंजू कंवर महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर


नई दिल्ली, 16 जुलाई (हि.स.)। राजस्थान के चूरू जिले की अंजू कंवर पारंपरिक 'बूंदी बंधेज' (टाई एंड डाई) कला के जरिए खुद आत्मनिर्भर के साथ- साथ अपने गांव की कई महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया भी बन गई हैं।

अंजू कंवर चूरू जिले के ठेलासर गांव की रहने वाली हैं और वह अपने हुनर से राजस्थान की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा को देश-दुनिया में एक नई पहचान स्थापित कर रही हैं।

अंजू दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित चार दिवसीय 'भारत टेक्स 2026' में ग्रामीण विकास मंत्रालय के प्रदर्शनी मंडप में बुधवार से अपना एक स्टाल लगाए हुए हैं। इस प्रदर्शनी मंडप का नाम 'नारी शक्ति' ( सरस शक्ति कलेक्शन) है। यहां उन्होंने अपने द्वारा तैयार कई कपड़े प्रदर्शित किये हैं।

अंजू ने गुरुवार को हिंदुस्थान समाचार से कहा, उनका यह काम पूरी तरह से टीम वर्क पर आधारित है। वे महिलाओं को कच्चा कपड़ा उपलब्ध कराती हैं, जिस पर महिलाएं अपने घरों में रहकर ही बंधेज (कपड़े को बांधने) का बारीकी से काम करती हैं। बंधेज का काम पूरा होने के बाद, उन कपड़ों पर रंगाई और फिनिशिंग का सारा काम अंजू स्वयं संभालती हैं।

अंजू ने बताया कि उनके गांव में वर्तमान में लगभग 30 से 35 स्वयं सहायता समूह सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। प्रत्येक समूह में 10-10 महिलाओं की भागीदारी है। इस तरह लगभग 300 से अधिक महिलाएं इस पारंपरिक कला से जुड़कर अपनी आजीविका चला रही हैं।

उन्होंने कहा कि बंधेज और रंगाई का काम हमारे पुरखों के समय से चला आ रहा है। राजस्थान के हर घर में यह कला रची-बसी है। पहले मैं केवल बंधेज बांधने का ही काम करती थी, लेकिन पिछले 4-5 सालों से मैंने खुद का सेटअप शुरू किया है। अब मैं रंगाई से लेकर मार्केटिंग और ऑनलाइन-ऑफलाइन बिक्री का काम खुद संभाल रही हूं।

अंजू ने बताया कि 'राजीविका' (राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद) के सहयोग से अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने के लिए देश भर के बड़े मंच मिले हैं। वे अब तक राजस्थान के कई जिलों का दौरा कर चुकी हैं। उन्होंने बताया कि 'सरस मेले' जैसे बड़े आयोजनों में उनके स्टॉल से 8 से 10 लाख रुपये तक की शानदार बिक्री हो जाती है, जबकि अन्य मेलों के माध्यम से वे सालाना 4 से 5 लाख रुपये तक का कारोबार आसानी से कर लेती हैं। इस व्यवसाय से उनकी हर महीने 30 हजार से 40 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है।

इस कार्यशाला का उद्देश्य ग्रामीण कारीगरों के हुनर को आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप तराशना और उन्हें नए व्यावसायिक अवसर प्रदान करना है।

उल्लेखनीय है कि 14-17 जुलाई तक चलने वाले 'भारत टेक्स 2026' के तीसरे संस्करण में भारत की आत्मनिर्भर होती ग्रामीण महिलाओं की कला और उनके हुनर का एक शानदार प्रदर्शन देखने को मिला। इस विशेष अवसर पर आयोजित गैलरी में 'नारी शक्ति' ( सरस शक्ति कलेक्शन) के प्रतीक के रूप में देश की 'लखपति दीदियों' द्वारा तैयार किए गए उत्कृष्ट उत्पादों को प्रदर्शित किया गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी