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राखीगढ़ी के कंकालों से खुलेंगे हड़प्पा सभ्यता के राज

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राखीगढ़ी के कंकालों से खुलेंगे हड़प्पा सभ्यता के राज


-राखीगढ़ी से मिले मानव कंकालों की होगी उन्नत वैज्ञानिक जांच, हड़प्पा सभ्यता के रहस्यों से उठ सकता है पर्दा

नई दिल्ली, 22 जून (हि.स.)। हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी पुरास्थल की खुदाई के दौरान प्राप्त मानव कंकालों को विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन और विश्लेषण के लिए भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) को सौंप दिया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के बीच हुए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत यह महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। इन कंकालों की आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से जांच किए जाने पर सिंधु-सरस्वती अथवा हड़प्पा सभ्यता के इतिहास, समाज, जीवनशैली और मानव विकास से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा हो सकता है।

केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, राखीगढ़ी को सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अब तक ज्ञात सबसे बड़ा नगरीय केंद्र माना जाता है। यह स्थल न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि विश्व की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से एक के अध्ययन का भी प्रमुख केंद्र है। पिछले कुछ वर्षों में यहां हुई पुरातात्विक खुदाइयों से ऐसे अनेक प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने हड़प्पा सभ्यता की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को समझने में नई दिशा प्रदान की है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव कंकालों के अध्ययन से उस समय के लोगों की जैविक संरचना, आनुवंशिक पृष्ठभूमि, खान-पान, स्वास्थ्य स्थिति और जीवनशैली के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकेगी। इसके अलावा यह भी समझने में मदद मिलेगी कि उस समय के लोग बदलती जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियों के साथ किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करते थे।

विशेषज्ञों के अनुसार, इन कंकालों पर प्राचीन डीएनए (एंशिएंट डीएनए) विश्लेषण, आइसोटोप अध्ययन, जैव-मानवविज्ञान परीक्षण और अन्य अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। डीएनए परीक्षण के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जाएगा कि हड़प्पा सभ्यता के लोग कौन थे, उनकी आनुवंशिक उत्पत्ति क्या थी, उनके पूर्वज किन क्षेत्रों से आए थे और वर्तमान आबादी के साथ उनका किस प्रकार का संबंध रहा है।

इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक यह भी पता लगाने का प्रयास करेंगे कि उस समय के लोगों का आहार कैसा था, वे किन कृषि उत्पादों या खाद्य पदार्थों का सेवन करते थे, उन्हें कौन-कौन सी बीमारियां प्रभावित करती थीं और उनका स्वास्थ्य स्तर कैसा था। हड्डियों और दांतों के विश्लेषण से उस काल के पोषण स्तर, जीवन प्रत्याशा और सामाजिक परिस्थितियों के बारे में भी महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त हो सकते हैं।

संस्कृति मंत्रालय के मुताबिक, वर्ष 2025-26 की खुदाई के दौरान राखीगढ़ी के ‘टीला संख्या-7’ (जो एक प्राचीन कब्रिस्तान है) से आठ कब्रें खोजी गई हैं। यह क्षेत्र एक प्राचीन कब्रिस्तान के रूप में चिन्हित किया गया है। इन कब्रों से प्राप्त तीन पूर्ण मानव कंकालों तथा कुछ अन्य अस्थि अवशेषों को आगे के अध्ययन के लिए कोलकाता स्थित एएसआई के प्राचीन मानव कंकाल भंडार एवं प्रयोगशाला में भेजा गया है। वहां प्रारंभिक संरक्षण और दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इनका विस्तृत वैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा।

इस बहु-संस्थागत अनुसंधान परियोजना में देश और विदेश के कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक एवं वैज्ञानिक संस्थान सहयोग कर रहे हैं। इनमें बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ़ पैलियोसाइंसेज़ और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं। इन संस्थानों के विशेषज्ञ आनुवंशिकी, मानवविज्ञान, पुरातत्व, जैव-विज्ञान और पुरापर्यावरण अध्ययन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में संयुक्त रूप से शोध करेंगे।

पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कुमारस्वामी थंगराज तथा बीएचयू के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे का कहना है कि लगभग 3000 ईसा पूर्व के मानव जीनोम का अध्ययन करने का अवसर अत्यंत दुर्लभ होता है। उनके अनुसार यह शोध न केवल हड़प्पा सभ्यता के लोगों की आनुवंशिक पहचान को समझने में मदद करेगा, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में मानव आबादी के विकास और प्रवास से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी दे सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राखीगढ़ी से प्राप्त जैविक साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति, उसके विस्तार, सामाजिक संरचना और विभिन्न आबादियों के बीच संबंधों को लेकर लंबे समय से चल रही बहसों को नई दिशा दे सकते हैं। साथ ही यह अध्ययन प्राचीन भारत के इतिहास को वैज्ञानिक आधार पर समझने और वैश्विक पुरातात्विक शोध में भारत की भूमिका को और मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

राखीगढ़ी में जारी अनुसंधान को भारतीय पुरातत्व और मानव इतिहास के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इन अध्ययनों के परिणाम हड़प्पा सभ्यता के अनेक अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठाने में सहायक सिद्ध होंगे और प्राचीन भारतीय इतिहास की समझ को और अधिक समृद्ध करेंगे।----------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी