अभाविप ने नालसार में स्नातक विद्यार्थियों के नामांकन को लेकर बार काउंसिल की प्रक्रिया को अनुचित बताया
नई दिल्ली, 14 अगस्त (हि.स.)। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान अकादमी (नालसार) के 2026 में स्नातक हुए विधि विद्यार्थियों के नामांकन को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया की पूरी प्रक्रिया को अनुचित बताया है और कहा है कि विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े निर्णय में जल्दबाजी से बचना चाहिए।
एक विज्ञप्ति में छात्र संगठन अभाविप ने कहा कि उसका स्पष्ट मत है कि किसी भी विद्यार्थी के संबंध में कार्रवाई सत्यापित तथ्यों, संबंधित व्यक्ति की भूमिका और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही की जानी चाहिए। यदि किसी प्रकरण में किसी व्यक्ति के आचरण को लेकर शिकायत या आरोप है तो संबंधित व्यक्ति की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर उसी के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए। सभी विद्यार्थियों को एक साथ प्रभावित करने वाला निर्णय किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
अभाविप का कहना है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अपने अधिकारों का प्रयोग करते समय विधिसम्मत प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए तथा भविष्य में ऐसे व्यापक निर्देश जारी करने से बचना चाहिए, जिनका प्रतिकूल प्रभाव उन विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ सकता है, जिनकी उस प्रकरण में कोई भूमिका स्थापित नहीं हुई है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि, “राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय नालसार के 2026 में स्नातक हुए विधि विद्यार्थियों के नामांकन पर रोक लगाने का प्रारंभिक निर्णय उचित नहीं था। बाद में इस निर्णय को वापस लिया जाना यह रेखांकित करता है कि विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित करने वाला कोई भी व्यापक निर्णय लेने से पूर्व उसके औचित्य, उपलब्ध तथ्यों और संभावित प्रभावों का समुचित परीक्षण आवश्यक है। यदि किसी प्रकरण में कुछ व्यक्तियों की भूमिका पर प्रश्न उठे हैं, तो उनकी व्यक्तिगत भूमिका और सत्यापित तथ्यों के आधार पर ही जांच एवं कार्रवाई होनी चाहिए। बिना समुचित जांच के सभी विद्यार्थियों को प्रभावित करना न्यायसंगत नहीं है। किसी भी वैधानिक या शिक्षा नियामक संस्था को विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित करने वाले निर्णय जल्दबाजी में लेने के स्थान पर उनके औचित्य एवं संभावित प्रभावों का समुचित परीक्षण करना चाहिए। अभाविप का स्पष्ट मत है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया सहित सभी नियामक संस्थाओं को ऐसे व्यापक निर्देश जारी करने से बचना चाहिए, जिनका अनावश्यक प्रभाव बड़ी संख्या में विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़े। प्रत्येक निर्णय में निष्पक्ष जांच, विधिसम्मत प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि हैदराबाद स्थित नालसार विश्वविद्यालय के 2026 दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को बुलाने का कुछ छात्रों ने विरोध किया। छात्रों की आपत्ति के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने पूरे 2026 बैच के छात्रों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक लगा दी। इस फैसले की आलोचना हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इसके बाद बार काउंसिल ने अपना आदेश वापस लेते हुए छात्रों को नामांकन की अनुमति दी, हालांकि विवाद की जांच जारी रखने की बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने भी बार काउंसिल की कार्रवाई पर सवाल उठाए और छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का समर्थन किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / अनूप शर्मा

