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छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के बिनागोंडा गांव में 45 साल बाद उत्साह से मनायी गई दिवाली

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छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के बिनागोंडा गांव में 45 साल बाद उत्साह से मनायी गई दिवाली


-पहली बार गांव में दिखी खुशियों की रोशनी

कांकेर/नारायणपुर, 07 नवंबर (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के अबूझमाड़ अंचल से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो बदलते सामाजिक परिवेश और शांति की नई उम्मीदों की कहानी बयां करती है। नारायणपुर जिले के नक्सल प्रभावित ग्राम बिनागोंडा में करीब 45 वर्षों बाद इस बार दिवाली का त्योहार खुशियों, उत्साह और आपसी भाईचारे के साथ मनाया गया।

दशकों तक भय और हिंसा के साये में रहे इस गांव में जब दीपों की रोशनी बिखरी तो यह नजारा महज एक त्योहार का आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन में नई उम्मीदों के आगमन का प्रतीक बन गया।

अबूझमाड़ क्षेत्र का बिनागुंडा (या बिनागोंडा) गाँव प्रशासनिक रूप से छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले की ओरछा (अबूझमाड़) तहसील के अंतर्गत आता है। जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार यह जिला मुख्यालय नारायणपुर से दक्षिण दिशा में लगभग 44 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। लेकिन पुलिस प्रशासन और नक्सल अभियानों के रिकॉर्ड के अनुसार यह छोटे बेठिया थाना (जिला कांकेर) क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित अबूझमाड़ के बिनागुंडा (बिनागोंडा) क्षेत्र में सुरक्षा बलों की मुस्तैदी और विकास कार्यों के चलते दशकों बाद इस वर्ष 2026 में दिवाली का त्योहार बेहद खास तरीके से मनाया गया है। हाल ही में सुरक्षा बलों और स्थानीय आदिवासियों ने मिलकर बिनागुंडा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पुल का निर्माण किया।

इस प्रतिबंधित घने वनांचल क्षेत्र में नक्सलियों ने आतिशबाजी और पटाखों पर रोक लगा रखी थी, क्योंकि वे पटाखों की आवाज़ का इस्तेमाल अपनी सुरक्षा इकाइयों के बीच संपर्क या लोकेशन बताने के लिए करते थे। क्षेत्र के नक्सलमुक्त होने के बाद अब यहाँ ग्रामीण और बच्चे खुलकर पटाखे जला रहे हैं। बिनागुंडा और अबूझमाड़ के अंदरूनी क्षेत्रों से ग्रामीण खुलकर नारायणपुर और नजदीकी बाजारों में दिवाली की खरीदारी (दीये, कपड़े और पटाखे) करने पहुंचे। नारायणपुर और उसके आसपास के वनांचल गांवों (जैसे कुतुल, बिनागोंडा) में सुरक्षा कैंप और नई सड़कें बनने से अब ग्रामीण बेझिझक बाजारों तक पहुंच रहे हैं। पहले जहां लोग आने-जाने से कतराते थे, अब वहां दिवाली की खरीदारी, मिठाइयों और दीयों की भारी मांग देखी जा रही है।

छत्तीसगढ़ प्रशासन की 'नियत नेल्लानार योजना' और बुनियादी सुविधाओं (सड़क, मोबाइल नेटवर्क, बिजली, पीडीएस राशन) के पहुंचने से दशकों से कटे हुए इन गांवों के लोगों में एक नया विश्वास जगा है। स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने के बाद अब दिवाली पर दीप जलाकर ग्रामीण राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाैटने के साथ उत्सव मना रहे हैं।

लंबे समय तक नक्सलवाद के प्रभाव से प्रभावित रहे इस इलाके में त्योहारों की रौनक और सामूहिक खुशियों का अभाव रहा। ऐसे माहौल में बिनागोंडा में दिवाली का आयोजन अपने आप में खास महत्व रखता है। जन संघर्ष समिति की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में दीपावली की खुशियां साझा की गईं। गांव में दीपों का जलना इस बात का भी प्रतीक बना कि भय के माहौल से बाहर निकलकर सामान्य सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की ओर लौटने की उम्मीद अब मजबूत हो रही है।

बताया गया कि एक शिक्षित, देशभक्त और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाले शहीद के बलिदान के बाद क्षेत्र में बदलाव और नई उम्मीदों का माहौल बना है। इसी पृष्ठभूमि में जन संघर्ष समिति ने बिनागोंडा में दिवाली मनाने की पहल की। यह आयोजन उन लोगों के लिए भी एक सकारात्मक संदेश लेकर आया, जो लंबे समय से क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और विकास की प्रतीक्षा कर रहे ह

सिर्फ त्योहार नहीं, बदलाव का संदेशबिनागोंडा में दिवाली का यह आयोजन कई मायनों में महत्वपूर्ण है। किसी भी क्षेत्र का वास्तविक विकास केवल सड़क, बिजली और भवनों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वहां के लोगों के जीवन में सुरक्षा का एहसास, सामाजिक मेलजोल, शिक्षा, संस्कृति और उत्सवों की वापसी भी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। करीब साढ़े चार दशकों बाद गांव में दिवाली की खुशियां मनाया जाना इसी बदलाव की एक उम्मीद जगाता है। दीपों की यह रोशनी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य, शिक्षा, शांति और विकास की आकांक्षाओं को भी अभिव्यक्त करती है।

जन संघर्ष समिति के अध्यक्ष दत्ता शिरके बताते हैं कि उनका यह स्वयंसेवी संगठन आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत है और नागपुर मुख्यालय से जुड़ा हुआ है। अभी उनके संगठन ने छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित रहे क्षेत्र में आदिवासियों के बीच काम करना शुरू किया है। उन्होंने बताया कि बिनागुंडा में उन्होंने सामाजिक उत्सव में लोगों को जोड़ना शुरु किया है और इसी के अंतर्गत लंबे समय से नक्सल प्रभावित रहे इस गांव में दिवाली का त्याेहार स्थानीय लोगों के साथ मिलकर मनाया।

छोटे बेठिया थाने के प्रभारी उप निरीक्षक लतेश्वरी बताते हैं कि बाहर पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं गांव आ रहे हैं और वह त्योहारों को ग्रामीणों के साथ मना रहे हैं। वहीं इस गांव के सीमांत क्षेत्र कोयली बेड़ा थाने के प्रभारी निर्मल जांगड़े का कहना है कि लंबे समय तक यह क्षेत्र नक्सलियों के कब्जे में रहा। वर्ष 2024 में 26 जनवरी के दिन यहां पर झंडा फहराने के कारण एक युवक को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था। लेकिन अब फिलहाल नक्सली प्रभाव और आतंक खत्म हो चुका है और लोग सामाजिक उत्सवों में भाग ले रहे हैं। वे कहते हैं कि नक्सल मूवमेंट खत्म हो गया है लोग अब रीति रिवाज सीख गए हैं और छात्र -छात्राएं अपने गांव पहुंचकर ग्रामीणों के साथ इन्हें मना रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि नक्सलमुक्त होने के बाद बस्तर में बहुत सारे परिवर्तन आए हैं। ग्रामीणों में उत्साह और उत्सव का माहौल है। अब वहां ऐसी स्थिति नहीं है कि शिक्षा दूतों का गला काट दिया जाएगा या जन अदालत लगाकर उनकी हत्या कर दी जाएगी। नक्सलमुक्त बस्तर में सभी को दिवाली की शुभकामनाएं।

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हिन्दुस्थान समाचार/ मनीष/ केशव केदारनाथ

हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी