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पूर्णिमा पर सुहागनें करेंगी वट वृक्ष की प्रतीकात्मक पूजा

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पूर्णिमा पर सुहागनें करेंगी वट वृक्ष की प्रतीकात्मक पूजा


पूर्णिमा पर सुहागनें करेंगी वट वृक्ष की प्रतीकात्मक पूजा


मुंबई,27 जून ( हि.स.) । वट पूर्णिमा के मौके पर, ठाणे की कई सुहागनें इस साल पर्यावरण के अनुकूल परंपरा का पालन करेंगी। उन्होंने बरगद की टहनियां काटकर घर लाने के बजाय, पास के जीवित बरगद के पेड़ की पूजा करने का फैसला किया है, या अगर बरगद का पेड़ उपलब्ध नहीं है, तो उन्होंने प्रतीकात्मक बरगद के पेड़ की तस्वीर बनाकर उसकी पूजा करने का फैसला किया है। आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक सुंदर संतुलन बनाने वाली इस पहल का पर्यावरणविदों ने स्वागत किया है।

पहले, ठाणे शहर में वड़, पीपल और अंबर जैसे स्थानीय पेड़ बहुत थे। इसलिए, महिलाएं वट पूर्णिमा पर आसानी से बरगद के पेड़ की पूजा कर सकती थीं। हालांकि, बढ़ते शहरीकरण के कारण, ये पेड़ तेजी से कम हो गए हैं। नतीजतन, कई जगहों पर बाजार से बरगद की टहनियां खरीदकर उनकी पूजा करने का चलन बढ़ गया है। पर्यावरणविदों ने इन डालियों के लिए बरगद के पेड़ों की बड़े पैमाने पर छंटाई पर चिंता जताई है।

इसी माहौल में, कई सुहासिनियों ने इस साल बरगद की डालियां काटने के बजाय इलाके में मौजूद किसी ज़िंदा बरगद के पेड़ की पूजा करने का फ़ैसला किया है। जिन इलाकों में बरगद का पेड़ नहीं मिलेगा, वहां कागज़ या बोर्ड पर बरगद के पेड़ की प्रतीकात्मक (सिंबॉलिक) तस्वीर बनाकर उसकी पूजा की जाएगी। आस्था बनाए रखते हुए पेड़ बचाने का मैसेज देने की यह कोशिश समाज के लिए प्रेरणा देने वाली साबित हो रही है।

पर्यावरणविद डॉ. प्रशांत सिंकर ने कहा कि पूजा में इस्तेमाल होने वाली बरगद की डाल को कूड़ेदान में फेंकने के बजाय, उसे गमले में लगाकर और उसकी देखभाल करके नया बरगद का पेड़ बनाया जा सकता है। इसलिए, परंपरा और पर्यावरण के बीच बैलेंस बनाने वाली यह पहल समाज में एक नया आदर्श बनाएगी।

ठाणे पूर्व कोपरी में निवास करने वाली श्रीमती संपदा टेबे टेबे पहले घर के पास बरगद का पेड़ होता था। अब उसे ढूंढना पड़ता है। इसलिए, इस साल मैं पास के बरगद के पेड़ की पूजा करूंगी। अगर पेड़ नहीं मिला, तो मैं सिंबॉलिक तस्वीर की पूजा करूंगी.. लेकिन डाल नहीं काटूंगी।

वर्तकनगर की गृहिणी श्रीमती अंजली सावंत ने कहा कि -वट पूर्णिमा से पहले, मार्केट में बरगद की डालियां बहुत बिकती हैं। मुझे पेड़ों को कोई नुकसान नहीं दिख रहा है। इसलिए, इस साल मैं वट पूर्णिमा एनवायरनमेंट फ्रेंडली तरीके से मनाऊंगी।

पर्यावरणविद डॉ प्रशांत रवीन्द्र सिनकर ने यह जानकारी देते हुए बताया कि -वड़, पीपल, अंबर जैसे , स्थानीय पेड़ पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। बरगद के पेड़ बहुत ज़्यादा ऑक्सीजन देते हैं, धूल के कण सोखते हैं और बायोडायवर्सिटी को बचाते हैं। इसलिए, सभी को ध्यान रखना चाहिए कि वट पूर्णिमा के मौके पर पेड़ों को नुकसान न पहुंचे।

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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा