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विकास के बहाने गौरैया के आसरे ढहा दिये-विजय कुट्टी

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विकास के बहाने गौरैया के आसरे ढहा दिये-विजय कुट्टी


मुंबई,20 मार्च ( हि.स.) । आज 'विश्व गौरैया दिवस' है। लेकिन मेरे लिए यह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का एक झरोखा है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ हमने 'स्मार्ट सिटी' और 'आलीशान फ्लैट्स' तो बना लिए, लेकिन उस सहज चहचहाहट को खो दिया जो कभी हमारे जीवन का संगीत हुआ करती थी। गौरैया, जो कभी हमारे रसोईघर के रोशनदानों और आंगन की तुलसी में बेखौफ फुदकती थी, आज कंक्रीट के इस निर्जीव जंगल में अपना अस्तित्व तलाश रही है।

पर्यावरण मित्रो का कहना है कि चिंतन किसी किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि उस प्राचीन विरासत के प्रति मेरी जिम्मेदारी से उपजा है जिसने मुझे 'संवेदना' सिखाई। हमारे पूर्वजों ने घरों का निर्माण केवल मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि समस्त जीवों के लिए किया था। 'सर्वभूतहिते रताः'—यानी हर जीवित प्राणी के कल्याण में आनंद पाना—यही हमारे संस्कारों की नींव थी।

पुराने समय में घरों की दीवारों में छोटे 'आले' या ताखे जानबूझकर छोड़े जाते थे ताकि गौरैया वहाँ अपना घर बसा सके। अनाज साफ करते समय मुट्ठी भर दाने आंगन में छोड़ देना कोई 'दान' नहीं, बल्कि उस नन्हे जीव के प्रति 'कृतज्ञता' थी। वे जानते थे कि जिस घर में पक्षियों का बसेरा नहीं, वह घर 'प्राणविहीन' है।

आधुनिकता का खालीपन और मेरा बोधजैसे-जैसे हम आधुनिक होते गए, हमने अपनी खिड़कियों को शीशों से सील कर दिया और आंगनों को टाइल्स से ढक दिया। 'सफाई' और 'मिनिमलिज्म' के जुनून में हमने गौरैया के तिनकों को 'कचरा' समझकर बाहर फेंक दिया।

मेरी चेतना तब जागी जब मैंने एक दोपहर एक गौरैया को अपनी बालकनी की चिकनी रेलिंग पर संघर्ष करते देखा। वह वहाँ बैठने की कोशिश कर रही थी, लेकिन फिसलन भरी आधुनिक वास्तुकला ने उसे वहां टिकने तक की जगह नहीं दी। उस पल मुझे गहरा दुख हुआ—क्या मेरी 'सुविधा' और 'लग्जरी' किसी का घर छीनकर खड़ी है? यह केवल दया का भाव नहीं था, बल्कि एक अपराधबोध था जिसने मुझे जिम्मेदारी का अहसास कराया।

जिम्मेदारी से सामंजस्य तक का सफरकरुणा जब जिम्मेदारी बनती है, तब वह केवल विचार नहीं रहती, 'आचरण' बन जाती है। मैंने अपनी बालकनी में बदलाव शुरू किए। शो-प्लांट्स की जगह मैंने तुलसी, गेंदा और करी पत्ता जैसे पौधे लगाए। मिट्टी के एक पुराने सकोरे में पानी और मुट्ठी भर बाजरा रखना शुरू किया।

आश्चर्य की बात यह थी कि जैसे-जैसे उन नन्हे पंखों की फड़फड़ाहट मेरे घर में वापस आई, मेरे भीतर का तनाव कम होने लगा। मैंने पाया कि मेरा जुड़ाव अब केवल इंसानी दुनिया तक सीमित नहीं रहा; वह ब्रह्मांडीय सामंजस्य (Cosmic Harmony) का हिस्सा बन गया। जब हम किसी ऐसे जीव की परवाह करते हैं जो हमें बदले में कुछ नहीं दे सकता, तब हमारा अहंकार पिघलने लगता है और हम वास्तव में 'मनुष्य' बनते हैं।

एक आह्वान: खुद को और प्रकृति को बचाएंआज के इस आधुनिक मानव से मेरा यही निवेदन है कि विकास की इस अंधी दौड़ में अपनी 'जड़ों' को न भूलें। गौरैया का संरक्षण कोई सरकारी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक 'सरोकार' होना चाहिए।

अपने फ्लैट की बालकनी में एक कोना इन पक्षियों के लिए 'सुरक्षित' छोड़ दें।

उन्हें तिनके जुटाने दें, उन्हें चहकने दें।

याद रखें, अगर गौरैया हमारे बीच से चली गई, तो यह केवल एक पक्षी का अंत नहीं होगा, बल्कि हमारे भीतर की उस 'करुणा' और 'प्राचीन बुद्धिमत्ता' का अंत होगा जो हमें जीवित रखती है।

अपनी खिड़की खोलिए, शायद वह नन्हा मेहमान आज भी आपके इंतजार में बाहर बैठा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा