गौरैया प्राकृतिक सखी , उसे बचाना गंभीर चुनौती -डॉ प्रशांत
मुंबई 19 मार्च (हि.स.) ।आम तौर पर हम सभी के घरों के किसी न किसी कोने अथवा घर के छोटे हिस्से में गौरैया के घोंसले देखने में मिल जाते हैं।उनकी चहचहाहट जब घर में सुनने मिलती हैरान प्रायः हर किसी को अच्छा लगता है।और तो और घर के सभी सदस्य भी उनकी सुरक्षा की परवाह करते थे। 20 मार्च को स्पैरो डे पर ठाणे के पर्यावरणविद डॉ प्रशांत ने अपनी चिंता प्रगट करते हुए सवाल किया है कि घरों की खिड़कियों, आंगनों और पेड़ों की डालियों पर लगातार चहचहाने वाली गौरैया पिछले कुछ सालों में शहर से लगभग खत्म होती दिख रही थीं। हालांकि, हाल के सालों में ठाणे और मुंबई में कुछ जगहों पर गौरैया के फिर से दिखने से पर्यावरणविदों और नागरिकों में उम्मीद की एक नई किरण जगी है। फिर भी, यह बढ़ोतरी बहुत कम है और हालात पूरी तरह से सुधरे नहीं हैं, जो कि उतना ही सच है।कल 20मार्च को गौरैया संरक्षण दिवस है । इस अवसर पर पर्यावरण मित्र डॉ प्रशांत रवीन्द्र सिनकर ने जोर देकर कहा कि गौरैया हमारी सहज मित्र है,क्योंकि वह पर्यावरण में सहायक है।इसलिए प्रकृति सहचरी है।कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फुदकती है तो कभी चावल के दाने चुगती है।तो कभी घर के अंदर शीशे पर अपनी चोंच मारती है।एक समय था कि जब बबूल के पेड़ के नीचे उसके सैकड़ों घोंसले लटके रहते थे।अब तो इसकी आबादी 60प्रतिशत से अधिक कम हो गई है।गौरैया हानिकारक कीड़े और कीट खाकर भी बीजों का प्रसार करती है,व फसलों की हिफाजत करती है। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं भी गौरैया स्वयं उसके संरक्षण की अपील कर चुके हैं। डॉ प्रशांत का कहना है कि बेतरतीब पेड़ो की कटाई के फलस्वरूप मुंबई ठाणे में गौरैया का दिखना कम हो गया है। पिछले दो दशकों में बढ़ते शहरीकरण के कारण गौरैया का प्राकृतिक आवास काफी हद तक खत्म हो गया है। ऊंची-ऊंची इमारतें, सीमेंट-कंक्रीट के जाल, पेड़ों की घटती संख्या और घोंसले बनाने के लिए जगह की कमी के कारण गौरैया धीरे-धीरे शहर से गायब होने लगीं। इसके अलावा, खेती और शहरी इलाकों में पेस्टिसाइड के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से उनके खाने वाले कीड़े-मकौड़े कम हो गए हैं। बढ़ता शोर और हवा का प्रदूषण भी उनके होने के लिए खतरा बन गया है।
हालांकि, पिछले कुछ सालों में हालात में कुछ अच्छे बदलाव आए हैं। कोविड लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण में कमी और काफ़ी शांत माहौल ने पक्षियों के लिए अच्छा माहौल बनाया है। साथ ही, कुछ एनजीओ और जागरूक नागरिकों ने अपने घरों की गैलरी में अनाज रखने, पानी के बर्तन रखने और आर्टिफिशियल घोंसले के बक्से लगाने जैसी एक्टिविटी शुरू करने की पहल की है। इन कोशिशों को ठाणे, नवी मुंबई और मुंबई की कुछ सोसाइटियों में अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है, और इसका नतीजा यह हुआ है कि गौरैया की मौजूदगी फिर से महसूस होने लगी है।
खग विशेषज्ञ के मुताबिक, गौरैया सिर्फ़ एक आम पक्षी नहीं है, बल्कि पर्यावरण की सेहत का एक ज़रूरी संकेत है। माना जाता है कि जिन इलाकों में गौरैया पाई जाती हैं, वहां खाना, पानी और सुरक्षित रहने की जगह होती है। इसलिए, हालांकि गौरैया की वापसी एक अच्छी बात है, लेकिन उनका होना अभी भी खतरे में है।
शहरों में तेज़ी से कंक्रीटिंग, पेड़ों की लगातार कटाई, पेस्टिसाइड्स के बढ़ते इस्तेमाल और प्रदूषण की समस्याओं के कारण गौरैया के लिए संकट जारी है। इसलिए, यह मान लेना खतरनाक हो सकता है कि सिर्फ़ कुछ इलाकों में दिख रही ग्रोथ एक स्थिर और सुरक्षित वापसी है। अगर हम आज जागरूक नहीं हुए, तो कल हमारी अगली पीढ़ी गौरैया को सिर्फ़ तस्वीरों और किताबों में ही देखेगी, यही असली डर है।
पर्यावरण मित्र डॉ प्रशांत रवीन्द्र सिनकर ने अपील की है कि गौरैया की सुरक्षा सिर्फ़ सरकार की ही नहीं, बल्कि हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है। घर की गैलरी में थोड़ा सा खाना रखना, पानी देना, पेड़ लगाना और आर्टिफिशियल घोंसले लगाना जैसे छोटे-छोटे काम बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

