मनपा के 2022 के आंकड़ों में सिर्फ 1,964 बरगद पेड़ ठाणे में शेष
मुंबई,30 जून ( हि.स.) । ठाणे मनपा की 2022 की पेड़ की गणना के मुताबिक,लगभग की तीस लाख आबादी के शहर में सिर्फ़ 1,964 बरगद के पेड़ बचे हैं। तब से, मेट्रो, रिंग रेलवे, सड़कों की कंक्रीटिंग और अलग-अलग विकास के कामों की वजह से कितने बरगद के पेड़ खत्म हुए, इसका अधिकृत संख्या अभी तक सामने नहीं आई है। बरगद पूजन के पारंपरिक त्योहार के पृष्ठभूमि में, पर्यावरण विशेषज्ञ ने इन देसी पेड़ों की संख्या में तेज़ी से कमी पर चिंता जताई है और उनके बचाव के लिए टिकाऊ उपायों की मांग की है।
एक समय था जब ठाणे शहर बरगद, पीपल और अंबर जैसे देसी पेड़ों की हरियाली से सजा हुआ था। इन पेड़ों की घनी छाया इलाके में तापमान को अंकुश करने में मदद करती थी। लेकिन, बढ़ते शहरीकरण, विकास योजनाओं और कंक्रीट के कारण यह पेड़ तेज़ी से गायब हो रहा है और शहर का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
पर्यावरणविद डॉ प्रशांत सिनकर का दावा है कि -बरगद का पेड़ सिर्फ़ आस्था की बात नहीं है, बल्कि पर्यावरण का एक सहारा है। यह पेड़ बड़ी मात्रा में कार्बन सोखकर जलवायु परिवर्तन के असर को कम करता है, गर्मी कम करता है, सतही जल व्यवस्थापन क्या बचाने में मदद करता है और हवा के प्रदूषण को कम करने में अहम भूमिका निभाता है।
एक बड़ा बरगद का पेड़ बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) के लिए एक जीता-जागता ठिकाना होता है। तोते, कोयल, उल्लू, बढ़ई, मैना, खारी, चमगादड़, मधुमक्खियां, तितलियां और अनगिनत कीड़े-मकोड़े इस पेड़ के आस-पास फलते-फूलते हैं। इसलिए, एक पुराना बरगद का पेड़ एक छोटे जंगल की तरह एक रिच इकोसिस्टम ( पारिस्थितिकीतंत्र ) होता है।
बदकिस्मती से, कई हाउसिंग कॉम्प्लेक्स और सोसाइटियों में बरगद के पेड़ की खेती से बचा जाता है। इस डर से कि इसकी ग्रोथ भविष्य में इमारतों के लिए खतरा बन सकती है, देसी पेड़ों के बजाय विदेशी सजावटी पेड़ों को प्राथमिकता दी जा रही है। नतीजतन, पक्षियों का रहने का ठिकाना कम हो रहा है और शहर की जैव विविधता को खतरा हो रहा है।
डॉ सिनकर ने बताया कि वड़ सिर्फ़ आस्था का ज़रिया नहीं है, बल्कि पूरी जैविक विविधता का आधार है। एक बड़ा वड़ का पेड़ सैकड़ों पक्षियों, कीड़ों और अनगिनत जीवों को पनाह देता है। इसलिए, वड़ के पेड़ों का बचाव सिर्फ़ एक पेड़ को बचाने के बारे में. नहीं है, बल्कि पूरे इकोसिस्टम( पारिस्थितिकीतंत्र ) की रक्षा के बारे में है। पूजा जितनी ज़रूरी है, उतना ही वड़ के पेड़ों को बचाने का संकल्प भी ज़रूरी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

