महिला आरक्षण विधेयक को लेकर नीलम गोऱ्हे का सुप्रिया सुले और प्रणिती शिंदे पर हमला
मुंबई 22 अप्रैल (हि.स.)। महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने वाली एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले और कांग्रेस सांसद प्रणिती शिंदे पर शिवसेना नेता नीलम गोऱ्हे ने हमला बोला है। उन्होंने कहा कि इन दोनों का महिला आरक्षण केवल दिखावटी है।
पार्टी कार्यालय में आयोजित पत्रकार परिषद को संबोधित करते हुए गोऱ्हे ने कहा कि इन दोनों नेताओं को राजनीति में स्थान परिवारवाद की विरासत से मिला है। महिला आरक्षण का लाभ सामान्य महिलाओं को मिलने वाला था, लेकिन सुले और शिंदे ने जो भूमिका अपनाई है, वह आरक्षण विरोधी है। नीलम गोऱ्हे ने नारी शक्ति वंदन विधेयक का विरोध करने वाले कांग्रेस सांसदों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई थी। राजीव गांधी ने मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पेश किया था, लेकिन यह सुनिश्चित किया गया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार न मिले। उन्होंने आरोप लगाया कि राजीव गांधी ने मुस्लिम महिलाओं के न्यायिक अधिकारों पर स्थायी आघात किया।
नीलम गोऱ्हे ने आगे कहा कि वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कानून में संशोधन कर तलाक पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार दिलाने का काम किया। उन्होंने कांग्रेस की एक महिला सांसद के उस बयान का भी खंडन किया जिसमें कहा गया था कि महिला आरक्षण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि राजीव गांधी ने 1986-87 में ही आरक्षण दे दिया था। उन्होंने इसे असत्य बताया और सवाल किया कि यदि आरक्षण पहले ही दिया गया था, तो फिर 1996 में संसद में महिला आरक्षण विधेयक लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। राजीव गांधी ने 1986-87 में कोई महिला आरक्षण विधेयक नहीं लाया था। महिला आरक्षण का पहला विधेयक 1996 में लाया गया। यदि कांग्रेस को महिला आरक्षण की आवश्यकता नहीं है तो फिर नगरपालिकाओं में आरक्षित सीटों पर महिला उम्मीदवार क्यों उतारती है। यदि महिला आरक्षण विधेयक लागू होता है, तो इसका बड़ा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए सरकार को मिलेगा। इसी वजह से कांग्रेस ने निर्वाचन क्षेत्र पुनर्गठन के साथ-साथ महिला आरक्षण विधेयक का भी विरोध किया, ताकि सामान्य महिलाएं राजनीतिक रूप से सशक्त न हो सकें।
वैश्विक आंकड़ों का हवाला देते हुए गोऱ्हे ने कहा कि दुनिया की संसदों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 27.5 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह 10 प्रतिशत से भी कम है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान गति से अवसरों में समानता वर्ष 2063 तक ही संभव होगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / वी कुमार

