home page

आरएसएस के संघसेवक और मज़दूर नेता डॉ. पांडुरंग राजाराम किनारे का निधन

 | 

मुंबई, 27 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवक और प्रख्यात मजदूर नेता डॉ. पांडुरंग राजाराम किनारे का 25 अगस्त को 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह लंबे समय से बढ़ती उम्र और अल्प बीमारी से पीड़ित थे, जिसके बाद ठाणे, महाराष्ट्र स्थित उनके निवास स्थान पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वे मज़दूर आंदोलन के पुराने कार्यकर्ता थे। उनके परिवार में तीन बेटे, तीन बहुएं और छह पोते-पोतियां हैं। जवाहर बाग श्मशान घाट पर उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया।

मूल रूप से राजापुर के रहने वाले पांडुरंग किनारे पढ़ाई के लिए मुंबई आए थे। उन्होंने पोद्दार मेडिकल कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने परेल, लालबाग और वर्ली को अपना कार्यक्षेत्र मानकर मेडिकल प्रैक्टिस शुरू की। बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वॉलंटियर रहे डॉक्टर ने इस इलाके में संघ का काम शुरू किया। उस समय के मुश्किल हालात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम फैलाते हुए डॉ. किनारे ने समाज के अलग-अलग तबके के लोगों को जोड़ा। 1966 में संगठन की सलाह पर डॉ. किनारे ने जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर राजापुर से चुनाव लड़ा। लेबर सेक्टर डॉक्टर के करीब था। शुरुआत में उन्होंने भारतीय मजदूर संघ और भारतीय मजदूर संघ से जुड़े नेशनल लेबर यूनियन के ज़रिए मज़दूरों की समस्याओं को हल करने को प्राथमिकता दी। कुछ ही समय में डॉ. किनारे मुंबई में एक विद्वान, लड़ाकू और मज़दूरों की भावनाओं से जुड़े व्यक्ति के तौर पर जाने जाने लगे। डॉ. किनारे की अलग-अलग विचारधाराओं के मज़दूर आंदोलन के नेताओं से दोस्ती थी। उस समय इंडियन एक्सप्रेस में हुई हड़ताल में डॉ. किनारे ने अहम भूमिका निभाई थी। सीनियर इकोनॉमिस्ट एस. गुरुमूर्ति ने डॉ. किनारे को अपनी श्रद्धांजलि में इसका ज़िक्र किया है। भारतीय जनता पार्टी बनने के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में डॉ. किनारे ने संगठन की सलाह पर वर्ली विधानसभा चुनाव लड़ा था। भारतीय जनता पार्टी के मज़दूर मोर्चे को बनाने में उनका अहम योगदान रहा है।

डॉ. किनारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वफ़ादार और समर्पित स्वयंसेवक के तौर पर जाने जाते थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों, काम और संघ के प्रचारकों और स्वयंसेवकों के काम के बारे में जानकारी देने के लिए साहित्य बनाने में खास पहल की थी। डॉ. किनारे की लिखी किताब तृप्ति तीर्थोदके खास तौर पर उल्लेखनीय रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी, डॉ. किनारे की प्रेरणा थे। श्रीगुरुजी की जन्म शताब्दी के साल में, डॉ. किनारे ने एक खास शॉर्ट फिल्म तैयार करने की पहल की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केंद्रीय नेतृत्व ने इस शॉर्ट फिल्म पर ध्यान दिया और संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि परिषद में डॉ. पांडुरंग किनारे को सम्मानित किया।

डॉ. किनारे ने 29 जुलाई को हुए गुरु पूर्णिमा समारोह में भी हिस्सा लिया था। वे एक ऐसे वॉलंटियर के तौर पर जाने जाते थे जो कभी गुरुपूजन नहीं छोड़ते थे। पिछले कुछ सालों से डॉ. किनारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बांटे गए लिटरेचर पर चर्चा करने की पहल कर रहे थे। डॉ. पांडुरंग रा किनारे के निधन से संघ ने एक समर्पित वॉलंटियर खो दिया है। अपने घर, परिवार, बिजनेस और यूनियन की देखभाल करते हुए संघ के विचारों को जीने वाले डॉ. श्री रा. किनारे ने ड्यूटी के नाते कई सामाजिक संगठनों को दान दिया है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / राजबहादुर यादव