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महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव: भाजपा ने शिवसेना शिंदे समूह पर लगाया साथ न देने का आरोप

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मुंबई, 29 अक्टूबर (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)ने गुरुवार को विधान परिषद चुनाव में अपेक्षित यश न मिलने पर अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना शिंदे समूह पर साथ न देने का आरोप लगाया है। इस चुनाव को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने बहुत जल्द पार्टी पदाधिकारियों की बैठक करने और दो नवंबर को दिल्ली जाकर रिपोर्ट पेश करने की बात कही है।

भाजपा के प्रवक्ता नवनाथ बन ने कहा कि महाराष्ट्र विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की पांच सीटों में से महायुति को केवल दो सीटों पर जीत मिली, जबकि महाविकास अघाड़ी ने तीन स्नातक सीटों पर कब्जा जमाया है।

इन चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा प्रवक्ता बन ने कहा कि शिवसेना के रुख के कारण गठबंधन को नुकसान उठाना पड़ा और तीन सीटें जीतने का मौका हाथ से निकल गया। उन्होंने कहा कि पुणे में शिवसेना की ओर से सचिन सनप को समर्थन दिए जाने से महायुति के वोटों का बंटवारा हुआ। उन्होंने दावा किया कि सनप को करीब 11 से 12 हजार वोट मिले, जो भाजपा के उम्मीदवार को मिल सकते थे। अगर ये वोट भाजपा को मिलते, तो पार्टी पुणे की स्नातक सीट भी जीत सकती थी।

उन्होंने छत्रपति संभाजीनगर में भी शिवसेना नेता अब्दुल सत्तार की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जहां महायुति का आधिकारिक उम्मीदवार मैदान में था, वहां सत्तार ने उसके खिलाफ प्रचार किया। जबकि छत्रपति संभाजीनगर में मविआ के खिलाफ प्रचार से गठबंधन की संभावनाएं प्रभावित हुईं। बान ने कहा कि पुणे में शिवसेना शिंदे समूह ने मंगेश चिवटे को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया था। हालांकि, चिवटे ने अपना नाम वापस ले लिया था।

महायुति को लगा कि इससे गठबंधन के भीतर तालमेल बन गया है, लेकिन बाद में शिवसेना ने सचिन सनप का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि एक सीट के लिए सहयोगी दलों को नुकसान पहुंचाना गठबंधन के हित में नहीं है। बान ने आरोप लगाया कि अगर शिवसेना ने महायुति के गठबंधन धर्म का पालन करते हुए भाजपा और महायुति का साथ दिया होता, तो गठबंधन पांचों सीटों पर जीत हासिल कर सकता था।

बन के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए शिवसेना के नेता रविंद्र धंगेकर ने कहा कि पार्टी ने गठबंधन में अपनी जिम्मेदारी निभाई है और जहां सहयोग की जरूरत थी, वहां अपने सहयोगियों की मदद की गई। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में चुनाव के नतीजे जनता के वोट से तय होते हैं और सभी दलों को उनका सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजे सरकार के कामकाज के प्रति मतदाताओं की राय को दर्शाते हैं। शिक्षकों की नाराजगी को भी इन नतीजों के संभावित कारणों में से एक बताया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजबहादुर यादव