डीप-टेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ही विकसित भारत 2047 की आधारशिला होंगे :डॉ. आर. ए. माशेलकर
मुंबई, 14 जुलाई (हि.स.)। रॉयल सोसाइटी के फेलो तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (ष्टस्ढ्ढक्र) के पूर्व महानिदेशक डॉ. रघुनाथ ए. माशेलकर ने मुंबई में कहा कि डीप-टेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और समावेशी नवाचार विकसित भारत 2047 के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकते हैं। बशर्ते भारत ऐसी प्रौद्योगिकियों और समाधानों का विकास करे जो विश्वस्तरीय होने के साथ-साथ किफायती हों और करोड़ों लोगों तक पहुंच सकें।
डॉ. मासेलकर मुंबई में आयोजित फिक्की लेजेंड्स सीरीज़ के अंतर्गत आयोजित विनिंग थ्रो इनोवेशन : लेशंस फोर इंडस्ट्री एंड सोसाईटी कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। डॉ. माशेलकर ने कहा कि भारत को अब वैश्विक तकनीकों का केवल उपभोक्ता बनने के बजाय डीप साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सरकार-उद्योग की सशक्त साझेदारी के माध्यम से विश्वस्तरीय नवाचारों का सृजनकर्ता बनना होगा। उन्होंने कहा कि भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर ऐसे उत्पादों और प्रौद्योगिकियों के विकास का है, जो कम संसाधनों में बेहतर प्रदर्शन करें तथा करोड़ों लोगों के लिए किफायती और सुलभ हों। उन्होंने कहा कि अब नवाचार का मूल्यांकन केवल तकनीकी जटिलता या महंगे उत्पादों के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि वह समाज की सबसे बड़ी चुनौतियों का व्यापक स्तर पर समाधान किस प्रकार करता है।
डॉ. माशेलकर ने कहा कि भारत ने सीमित संसाधनों के बावजूद अनेक क्रांतिकारी नवाचार विकसित कर यह सिद्ध किया है कि वैश्विक स्तर की तकनीकें कम लागत पर भी तैयार की जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि अब समय केवल वैश्विक तकनीकों को अपनाने का नहीं, बल्कि दुनिया के लिए नई कार्य-पद्धतियां विकसित करने का है। उन्होंने भारत की डिजिटल क्रांति, सस्ती डेटा सेवाओं, डीप-टेक उद्यमिता तथा ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में भारत ने वैश्विक नेतृत्व की क्षमता प्रदर्शित की है।
डॉ. माशेलकर ने कहा कि नवाचार तभी फलता-फूलता है, जब सरकारें उच्च जोखिम वाले अनुसंधान और विघटनकारी प्रौद्योगिकियों को सक्रिय समर्थन देती हैं। उन्होंने सरकारों से आग्रह किया कि वे मिशन आधारित कार्यक्रमों, साहसिक निवेश और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से शुरुआती तकनीकी जोखिम अपने ऊपर लें, ताकि स्टार्टअप्स और शोधकर्ता राष्ट्रीय महत्व की चुनौतियों पर काम कर सकें।
इस अवसर पर फिक्की के पूर्व अध्यक्ष तथा कनोरिया केमिकल्स एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक आर. वी. कनोरिया ने कहा, नवाचार अब केवल प्रयोगशालाओं या शोध संस्थानों तक सीमित नहीं है। आने वाले दशकों में यही भारत की आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता, तकनीकी नेतृत्व और समावेशी विकास की दिशा तय करेगा। उद्योग के सामने चुनौती केवल आकार बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसे समाधान विकसित करने की है जो अधिक मूल्य सृजित करें और समाज के कहीं बड़े वर्ग को लाभान्वित करें।
फिक्की ड्रोन समिति के सह-अध्यक्ष अंकित मेहता ने कहा, डॉ. माशेलकर की प्रेरणादायी यात्रा और उनका दर्शन हमें यह सिखाता है कि प्रौद्योगिकी का वास्तविक उद्देश्य केवल चुनिंदा लोगों के लिए नवाचार करना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले जन-स्तरीय समाधान विकसित करना है। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्योग, शिक्षण संस्थानों, स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और सरकार के बीच मजबूत सहयोग अत्यंत आवश्यक होगा।
फिक्की लेजेंड्स सीरीज़ के अंतर्गत आयोजित इस विशेष सत्र में देश के प्रमुख उद्योगपति, नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, उद्यमी, स्टार्टअप संस्थापक, शोधकर्ता तथा व्यापार जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। चर्चा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि भारत को ऐसी प्रौद्योगिकियों का विकास करना होगा जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल और सामाजिक रूप से समावेशी हों तथा भारत को किफायती उत्कृष्टता और डीप-टेक नवाचार के क्षेत्र में विश्व नेतृत्व दिला सकें।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजबहादुर यादव

