युद्ध के दौरान पर्यावरण रक्षा हेतू भारत नेतृत्व कर पहल करे
मुंबई,23 मार्च ( हि.स.) । दुनिया इस समय बहुत अस्थिर और चिंताजनक स्थिति से गुज़र रही है, और अलग-अलग देशों के बीच संघर्ष और युद्ध से जुड़े तनावों ने इंसानी ज़िंदगी को बहुत परेशान किया है। लेकिन, प्रकृति, पर्यावरण और जंगली जानवर इस युद्ध में असली ‘मौन साक्षी ’ हैं। इस बात पर अफ़सोस जताते हुए कि दुनिया भर में उनके दर्द को ज़्यादा नहीं सुना जा रहा है, ठाणे के पर्यावरणविद डॉ. प्रशांत सिनकर ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे एक पत्र में ज़ोरदार मांग की है कि युद्ध के समय पर्यावरण की रक्षा के लिए भारत को पहल करनी चाहिए और दुनिया को लीड करना चाहिए।
डॉ. सिनकर ने अपने पत्र में साफ़ तौर पर कहा है, “युद्ध सिर्फ़ बॉर्डर विवाद या राजनीतिक दबदबे की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह प्रकृति पर सबसे बड़ा अत्याचार है।” आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल, रासायनिक प्रदूषण और भारी धमाके हज़ारों एकड़ जंगल खत्म कर रहे हैं और नदियों में ज़हर घोल रहे हैं। जिन जंगली जानवरों का इस लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है, वे अपना रहने की जगह खो रहे हैं और परस्थिति अनुसार संतुलन बिगड़ रहा है।
भारत एक ऐसा देश है जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की सिद्धांतों पर चलता है और ‘मिशन लाइफ’ के ज़रिए दुनिया को स्थित जीवन शैली का मैसेज दे रहा है। इसी पृष्ठभूमि में, डॉ. सिनकर ने ‘ पर्यावरण हेतू शांति निर्माण ’ का एक नया तरीका सामने रखा है और मांग की है कि भारत इंटरनेशनल लेवल पर युद्ध के दौरान पर्यावरण को होने वाले नुकसान को ‘ह्यूमैनिटेरियन क्राइम’ (मानवीय अपराध) घोषित करने की पहल करे। उन्होंने इसके लिए ‘यूनाइटेड नेशंस’ के ज़रिए एक स्पेशल तकनीकी कार्यकारी समूह बनाने का भी सुझाव दिया है।
उन्होंने युद्ध से प्रभावित सीमा वर्ती इलाकों से पलायन करने वाले जंगली जानवरों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समझौता और युद्ध के बाद उन इलाकों में बायोडायवर्सिटी को ठीक करने के लिए ‘इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन फंड’ (पारिस्थितिक पुनः स्थापना निधि) बनाने जैसे ज़रूरी प्रस्ताव भी रखे हैं।
“अगर यह धरती ही रहने लायक नहीं रही, तो कोई भी जीत या तरक्की बेकार हो जाएगी। भारत की संस्कृति प्रकृति की पूजा करने वाली है। इसलिए, यह समय की ज़रूरत है कि भारत असरदार नेतृत्व करे और दुनिया को सिर्फ़ युद्ध विराम का ही नहीं, बल्कि ‘सृष्टि बचाओ’ का भी संदेश दे,” डॉ. सिनकर ने अपने पत्र के आखिर में एक इमोशनल अपील की है।इस पत्र के ज़रिए उन्होंने दुनिया के सामने विश्व शांति के साथ-साथ ‘पारिस्थितिक शांति’ का एक नया और बहुत ज़रूरी विचार पेश किया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

