संजय गांधी पार्क उजड़ा तो ठाणे की हवा होगी विषैली_डॉ प्रशांत
मुंबई ,20 मार्च ( हि.स.) । ठाणे का ‘दिल’ कहा जाने वाला संजय गांधी नेशनल पार्क आज गंभीर खतरे के कगार पर है। यह ग्रीन सैंक्चुअरी, जो कभी करीब 104 स्क्वायर किलोमीटर में फैली थी, दिन-ब-दिन सिकुड़ती जा रही है और इंसानी दखल के कारण इसका दायरा कम होता जा रहा है। वर्ल्ड फॉरेस्ट डे के मौके पर एक बार फिर इस चिंताजनक सच्चाई की ओर ध्यान दिलाया जा रहा है। शहर के तेजी से हो रहे विकास के चक्कर में यह प्राकृतिक ‘फेफड़ा’ दम घुटने लगा है, जिसका सीधा असर यहां की रिच बायोडायवर्सिटी पर पड़ रहा है।
यह पार्क तेंदुए, हिरण, खरगोश, अलग-अलग तरह के सांपों और सैकड़ों पक्षियों का घर है। हालांकि, जैसे-जैसे जंगल का एरिया कम होता जा रहा है, उनके रहने की जगहों पर खतरा मंडरा रहा है। नतीजतन, वाइल्डलाइफ शहर की ओर बढ़ रहे हैं और इंसान-वाइल्डलाइफ टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह सिर्फ़ वाइल्डलाइफ़ का संकट नहीं है, बल्कि पूरे इकोलॉजिकल बैलेंस के बिगड़ने की चेतावनी है।
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरणविदों के मुताबिक, कुछ इलाकों में, राजनीतिक रूप से समर्थित बिल्डर लॉबी और लैंड माफिया पार्क की सीमाओं पर कब्ज़ा कर रहे हैं। बफ़र ज़ोन धीरे-धीरे कम हो रहा है, जिससे जंगल के मूल हिस्से को खतरा पैदा हो रहा है। सही प्लानिंग की कमी, अपर्याप्त मॉनिटरिंग और सख्त कार्रवाई की कमी के कारण यह समस्या दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है।
पार्क में पानी के स्रोतों की हालत भी चिंताजनक है। अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण झीलें, नदियाँ और प्राकृतिक जलस्रोत सूखने की कगार पर हैं। इन पानी के स्रोतों का असर सिर्फ़ पार्क तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मुंबई-ठाणे इलाके के मौसम, बारिश और ग्राउंडवाटर लेवल पर पड़ रहा है।
फ़ॉरेस्ट डे के मौके पर, पर्यावरणविदों और जागरूक नागरिकों ने एक भावनात्मक अपील की है कि, “यह सिर्फ़ एक जंगल नहीं है, यह शहर की साँस है। अगर यह हरियाली खत्म हो गई, तो आने वाली पीढ़ियों को साफ़ हवा और सुरक्षित माहौल नहीं मिलेगा।” उनका कहना है कि अतिक्रमण रोकना, बफर ज़ोन की सख्त सुरक्षा, लोकल हिस्सेदारी बढ़ाना और सस्टेनेबल डेवलपमेंट को लागू करना आज के समय की ज़रूरत है।
पर्यावरणविद डॉ प्रशांत का कहना है कि आज वर्ल्ड फॉरेस्ट डे मनाते हुए, हमें सिर्फ़ पेड़ लगाने के बजाय, संजय गांधी नेशनल पार्क को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है, जो हमारी आँखों के सामने सिकुड़ रहा है। क्योंकि जंगल बचेंगे, तभी शहर बचेगा और शहर बचेगा, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित होगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

