मछुआरों के एतराज पर, कोपरी स्टैंड पुल पर एमएमआरडीए जांच करेंगी
मुंबई, 04 अक्टूबर ( हि. स.) I ठाणे शहर के पूर्वी छोर जबकि क्रीक के पानी पर डेवलपमेंट ब्रिज बनाया जा रहा है, मछुआरा समुदाय के पारंपरिक अधिकारों का मुद्दा चर्चा में आया है, जो पीढ़ियों से इस क्रीक पर अपना गुज़ारा कर रहे हैं। मछुआरों ने प्रस्तावित कोपरी-पटनी केबल-स्टेड ब्रिज पर एतराज़ जताया है, और उनके लिखित एतराज़ों पर ध्यान देते हुए, महाराष्ट्र मैरीटाइम बोर्ड (MMB) ने MMRDA को इन एतराज़ों की जांच करने और आगे की कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
चूंकि प्रस्तावित ब्रिज का रास्ता रामसर साइट, चेंदानी पोर्ट, फ्लेमिंगो एरिया और कंदलवन एरिया के पास से गुज़रता है, इसलिए इस इलाके की पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का मुद्दा भी सामने आया है। यह कहा गया है कि इस प्रोजेक्ट का असर स्थानीय मछुआरा समुदाय की पारंपरिक मछली पकड़ने के साथ-साथ पब्लिक जगहों पर भी पड़ सकता है।
MMRDA ( एम एमआरडीए )की मांग के मुताबिक, MMB ने पहले पुल बनाने के लिए 100 मीटर हॉरिजॉन्टल क्लीयरेंस और 10 मीटर वर्टिकल क्लीयरेंस तय करके टेम्पररी नो-ऑब्जेक्शन दिया था। हालांकि, मछुआरों के लिखित आपत्ति मिलने और सही जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की गई है।
चेंदानी कोलीवाड़ा के रहने वाले और अखिल भारतीय कोली समाज के ठाणे डिस्ट्रिक्ट प्रेसिडेंट आनंद प्रभाकर कोली ने इस प्रोजेक्ट को लेकर फिशरीज एंड पोर्ट्स मिनिस्टर के पास ऑब्जेक्शन आपत्ति दर्ज कराई थी । उन्होंने संभावना जताई है कि प्रस्तावित पुल से स्थानीय लोगों के पारंपरिक मछली पकड़ने, तटीय इलाकों और पब्लिक इस्तेमाल वाले इलाकों पर असर पड़ेगा।
जबकि चेंदानी कोलीवाड़ा के सीमांकन की प्रक्रिया चल रही है, यह साफ करना जरूरी है कि प्रस्तावित पुल का रास्ता, बनाने का इलाका और इसके लिए जरूरी इलाके स्थानीय लोगों के पारंपरिक इस्तेमाल पर असर नहीं डालेंगे। मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले रास्ते, तटीय इलाके और पब्लिक एक्टिविटी वाले इलाके स्थानीय कोली समुदाय की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। इन जगहों का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से अंतिम संस्कार, नारली पूर्णिमा, कोली महोत्सव, गणपति और देवी विसर्जन समेत कई धार्मिक और सामाजिक कामों के लिए भी किया जाता है।
ठाणे खाड़ी का इलाका मैंग्रोव, फ्लेमिंगो और दूसरी बायोडायवर्सिटी के लिए ज़रूरी है। इसलिए, पुल बनाने के दौरान खुदाई, कंस्ट्रक्शन मटीरियल की ढुलाई, ट्रांसपोर्टेशन और भविष्य में खाड़ी के इकोसिस्टम पर बढ़े ट्रैफिक के असर का साइंटिफिक तरीके से आकलन करना ज़रूरी होगा। मछुआरों का कहना है कि डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के साथ-साथ पर्यावरण और स्थानीय लोगों की रोज़ी-रोटी के बीच बैलेंस बनाए रखा जाना चाहिए।
MMB के निर्देशों के बाद, MMRDA को अब मछुआरों के एतराज़ों की जांच के बाद प्रोजेक्ट प्लान और स्थानीय इस्तेमाल वाले इलाकों पर संभावित असर को साफ़ करना होगा। इसलिए, इस बात पर ध्यान दिया गया है कि इस डेवलपमेंट पुल के साथ खाड़ी का पर्यावरण और कोली समुदाय के पारंपरिक अधिकार किस हद तक बरकरार रहें।
भारतीय कोली समाज के अध्यक्ष आनंद प्रभाकर कोली का कहना है कि -मांग की गई है कि प्रोजेक्ट को स्थानीय समुदाय को भरोसे में लेकर ही लागू किया जाए। अगर कोस्टल रोड, रिंग रोड, इनर रिंग मेट्रो, क्रीक पर पुल और वाटरफ्रंट जैसे प्रोजेक्ट पारंपरिक इस्तेमाल वाले इलाकों पर असर डालते हैं, तो लोकल लोगों को शामिल किया जाना चाहिए और उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

