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पर्यावरण पूरक बप्पा की सजावट से मूक- बधिर बच्चों को रोज़गार का मौका

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पर्यावरण पूरक बप्पा की सजावट से मूक- बधिर बच्चों को रोज़गार का मौका


मुंबई,19 अगस्त ( हि.स.) । गणपति बप्पा की सजावट... प्रकृति का एहसास... और कुछ खास बच्चों की कला से रोज़गार का मौका! हेरम आर्ट के ज़रिए मूक-बधिर बच्चे पर्यावरण पूरक (इको-फ्रेंडली )चीज़ों से आकर्षक गणेशोत्सव की सजावट बना रहे हैं, और अपनी कला के ज़रिए पर्यावरण बचाने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता का संदेश भी दे रहे हैं।

बांस, लकड़ी की पट्टियों, कार्डबोर्ड, झालर, लेस और गोंद जैसी चीज़ों का क्रिएटिव इस्तेमाल करके कई तरह की सजावट बनाई गई है। छोटे देवरा, मंदिर, सिंहासन, चेज़ लॉन्ग के साथ-साथ गौरी-गणपति फ्रेम जैसी आकर्षक सजावट गणेश भक्तों का ध्यान खींच रही है।

इस पहल की खास बात यह है कि इन सजावटों को बनाने में मूक-बधिर बच्चे भी शामिल हैं। ये बच्चे अपने हुनर को तराशकर डेकोरेशन बनाते हैं। इसलिए, उनकी कला की न सिर्फ तारीफ हो रही है, बल्कि इससे उन्हें नौकरी के मौके भी मिल रहे हैं। हेरम आर्ट ने इन बच्चों को कला के ज़रिए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का एक प्लैटफ़ॉर्म दिया है।

खास बात यह है कि गणपति बप्पा की प्रतिमा श्रृंगार के लिए जान-बूझकर प्लास्टिक और थर्मोकोल जैसे पर्यावरण के लिए नुकसानदायक मटीरियल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसकी जगह नेचुरल, रिसाइकिल होने वाले और आसानी से मिलने वाले सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए, आकर्षक साज सज्जा के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल गणेशोत्सव का मैसेज भी दिया जा रहा है।

इस बारे में हेरम आर्ट के प्रमुख कैलाश देसले ने कहा है कि -बप्पा की सांस्कृतिक सजावट सुंदर होनी चाहिए; लेकिन उससे प्रकृति को नुकसान नहीं होना चाहिए। साथ ही, इस पहल का उद्देश्य से खास बच्चों के हुनर को नौकरी के मौके देना है,।

हालांकि गणेशोत्सव कुछ दिनों का होता है, लेकिन डेकोरेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक, थर्मोकोल और दूसरे खतरनाक सामग्री से निकलने वाला कचरा पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या है। इसलिए, इस साल के गणेशोत्सव में पर्यावरण के अनुकूल डेकोरेशन अपनाने की अपील की जा रही है।

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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा