ठाणे बीजेपी को शिकवा,अकेले चुनाव लड़ते तो ज्यादा स्थान जीतते
मुंबई,19 जनवरी ( हि.स.) । ठाणे महानगर पालिका चुनाव में बीजेपी ने कम सीटों पर चुनाव लड़ा और 74 % के स्ट्राइक रेट के साथ 38 में से 28 पार्षद चुने गए। इस बेहतर परिणाम के लिए भाजपा के मुख्य चुनाव प्रमुख विधायक संजय केलकर की पार्टी हलकों में तारीफ हो रही है।
ठाणे विधायक संजय केलकर भूमिका थी कि वे ठाणे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन चुनाव में शिवसेना शिंदे गुट के साथ समझौता किए बिना अकेले चुनाव लड़ेंगे। हालांकि, राज्य स्तर पर वरिष्ठ नेताओं द्वारा महा गठबंधन बनाने का फैसला करने के बाद, भाजपा ने गठबंधन धर्म निभाते हुए ठाणे में चुनाव लड़ा। इसके लिए पार्टी ने वरिष्ठ बीजेपी नेता संजय केलकर को इलेक्शन चीफ बनाया। मिस्टर केलकर के लेजिस्लेटिव काउंसिल मेंबर के तौर पर रहने के बाद, उन्होंने तीन बार लेजिस्लेटिव असेंबली का चुनाव जीता। ठाणे शहर में उनके हर तरफ के डेवलपमेंट के कामों और लंबे समय से चले आ रहे सोशल कामों की ठाणे के लोगों ने सच में तारीफ की। उनके चुनाव क्षेत्र में ग्रैंड अलायंस के 35 में से 31 कैंडिडेट चुने गए।
विधायक केलकर हमेशा इस बात पर ज़ोर देते थे कि सीट बंटवारे में 131 में से कम से कम 50 से 55 सीटें दी जाएं। हालांकि, सिर्फ़ 40 सीटें मिलने से कार्यकर्ता नाराज़ थे। वे उन्हें मनाने में भी सफल रहे। दो और सीटें कम होने पर बीजेपी ने ठाणे में 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। दिग्गज भाजपा नेता केलकर ने वरिष्ठ सहयोगी नेताओं की मदद लेकर पार्टी में नए चेहरे उतारे। इनमें मिसेज यादव, उषा वाघ, अनीता ठाकुर, माधुरी मेटांगे, वैभव कदम, सीताराम राणे, विकास पाटिल वगैरह शामिल थे। इसलिए, कैंपेन में और वोटिंग के दिन उनकी भागीदारी बहुत ज़्यादा देखी गई, क्योंकि वर्कर्स की नाराज़गी की जगह जोश ने ले ली। इसके अलावा, वोटर्स के बीच एक पॉज़िटिव माहौल बना। इस बारे में, विधायक संजय केलकर ने भी कैंपेन के दौरान रेगुलर तौर पर लोगों से पर्सनली मिलकर उनसे वोट देने की अपील की, और कैंडिडेट्स की कैंपेन रैलियों के ज़रिए लोगों से बातचीत की। इसका मनचाहा असर हुआ और बीजेपी के 38 में से 28 कैंडिडेट्स चुने गए। स्ट्राइक रेट 74 परसेंट रहा। खास बात यह है कि नए चुने गए कॉर्पोरेटर वागले एस्टेट, वर्तकनगर से लेकर घोड़बंदर और दिवा-शील इलाकों से थे। इसलिए, इस चुनाव से पता चला कि भाजपा का कैरियर दोगुना हो गया है। अगर ज़्यादा सीटें मिलतीं या अगर आत्मनिर्भर होकर चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया गया होता, इस स्थिति में मेयर भी भाजपा का होता, तो न्यूनतम दोगुने पार्षद चुने जाते, ऐसा अब एक्टिविस्ट्स का मानना है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

