ठाणे में हरियाली अभाव से दहकता शहर, पारा आसमां पर
मुंबई,19 अप्रैल ( हि.स.) । ठाणे शहर में अभी तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस के निशान पर पहुंच गया है, और तस्वीर यह बन रही है कि बढ़ती कंक्रीटिंग की वजह से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का असर और बढ़ रहा है। कभी अपनी हरियाली के लिए जाना जाने वाला ठाणे अब सीमेंट-कंक्रीट के जाल में फंसता जा रहा है, जिसका सीधा असर एनवायरनमेंट और यहां के लोगों की हेल्थ पर पड़ रहा है। ठाणे शहर में विगत कई दशकों से पेड़ो की अधाधुंध कटाई से पारा आसमान पर चढ़ गया है।
अर्बन इकोलॉजी के मुताबिक, खुली ज़मीन, पानी के सोर्स और घनी पेड़-पौधे नेचुरल कूलिंग के लिए बहुत ज़रूरी फैक्टर हैं। हालांकि, शहर में कंक्रीट की डामर सड़कें, बढ़ते कंस्ट्रक्शन और कांच की ऊंची इमारतें गर्मी सोखने और उसे लंबे समय तक बनाए रखने के प्रोसेस को बढ़ा देती हैं। नतीजतन, दिन-रात के टेम्परेचर में अंतर कम हो जाता है और इलाका गर्म रहता है।
ठाणे में विगत कई दशकों से हो रही हरे भरे वृक्षों को विकास के नाम पर हटाया जाता है। सूत्रों की माने तो अभी भी ठाणे की मेट्रो के लिए साढ़े तीन हजार पेड़ो की बलि देने जाने की संभावना है। पेड़ो के कटने से दूर दूर ठाणे में मिट्टी की सुगंध अब नदारद हो गई है ।इधर खुली जगह और हरियाली तेज़ी से कम होने से ‘इवैपो-ट्रांसपिरेशन’ का नैचुरल प्रोसेस कम हो रहा है। पेड़ों की एटमॉस्फियर में गर्मी कम करने की कैपेसिटी बढ़ रही है, जिससे शहर में गर्मी जमा होने की दर बढ़ रही है। खास तौर पर, बड़े, छायादार पेड़ों को काटकर उनकी जगह सजावटी या तेज़ी से बढ़ने वाले लेकिन कम एनवायरनमेंट फ्रेंडली पेड़ लगाने का बढ़ता ट्रेंड हालात को और खराब कर रहा है।
जानकर लोगों के मुताबिक, कांच की सीमेंट इमारत लोकल लेवल पर ‘ग्रीनहाउस इफ़ेक्ट’ पैदा करती हैं। सूरज की रोशनी अंदर तो आती है, लेकिन गर्मी पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाती, जिससे इलाके का तापमान और बढ़ जाता है। इसके अलावा, गाड़ियों की बढ़ती संख्या, एयर कंडीशनर का इस्तेमाल और इंडस्ट्रियल एक्टिविटीज़ भी गर्मी को बढ़ा रही हैं।
गर्मी बढ़ने का सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है, और यह कहा जा रहा है कि हीट स्ट्रोक, सांस की बीमारियां और दिल की बीमारियां बढ़ने की संभावना है। सीनियर सिटिजन, बच्चे और बाहर काम करने वाले लोग खास तौर पर इससे प्रभावित होते हैं।
पर्यावरणविदों के अनुसार, स्थिति को कंट्रोल करने के लिए शहर में ‘ग्रीन कवर’ बढ़ाना, देसी पेड़ों की प्रजातियों को बचाना, बारिश का पानी इकट्ठा करना, खुली ज़मीनों को बचाना और ‘कूल रूफ’ टेक्नोलॉजी अपनाना ज़रूरी है। साथ ही, अर्बन प्लानिंग में इकोलॉजिकल बैलेंस को प्राथमिकता देना भी समय की ज़रूरत बन गया है।
कुदरत की मेहरबानी से नवाज़ा गया ठाणे शहर इस समय डेवलपमेंट और पर्यावरण के बीच टकराव के दौर में है। सही समय पर साइंटिफिक और इको-फ्रेंडली उपाय लागू करके ही भविष्य में गर्मी और प्रदूषण के खतरे को टाला जा सकता है; नहीं तो ‘स्मार्ट सिटी’ के साथ-साथ ‘हॉट सिटी’ के तौर पर भी पहचान बनने का डर है।
पर्यावरणविद डॉ प्रशांत सिनकर का कहना है कि “ ठाणे शहर में सीमेंट-कंक्रीट बढ़ने से ज़मीन गर्मी सोख लेती है और हवा के ठंडा होने का प्रोसेस धीमा हो जाता है; इसीलिए ठाणे में तापमान बढ़ रहा है—इसका आसान और असरदार हल हरियाली बढ़ाना है।”
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

