ठाणे में श्रद्धालुओं को भव्य आधुनिक विसर्जन घाट बनाए - डॉ प्रशांत
मुंबई,29 मार्च ( हि.स.) । ठाणे के पर्यावरणविद डॉ. प्रशांत रवींद्र सिनकर ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एक डिटेल्ड बयान दिया है, जिसमें ठाणे शहर में कृत्रिम विसर्जन तालाबों और खाड़ियों में विसर्जन तरीके के मुद्दे को हल करने और श्रद्धालुओं हेतू गणेश विसर्जन को पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ दिशा देने की मांग की गई है। उन्होंने बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए लंबे समय के उपायों को लागू करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है।
उल्लेखनीय है कि गणेशोत्सव महाराष्ट्र राज्य के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का एक अहम हिस्सा है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि विसर्जन के पारंपरिक तरीके से नदियों, झीलों और खाड़ियों पर पर्यावरण का दबाव बढ़ रहा है। खासकर ठाणे खाड़ी इलाके में, पानी के प्रदूषण की समस्या गंभीर होती जा रही है क्योंकि हर साल बड़ी संख्या में मूर्तियों का विसर्जन होता है।
इस संदर्भ में, ठाणे नगर निगम मानव निर्मित तालाबों और लोहे के टैंकों का इंतज़ाम करता है। हालांकि, सिनकर ने बताया कि इन उपायों को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिल रही है क्योंकि भक्तों का फ्लो प्राकृतिक पानी के सोर्स की ओर है।
डॉ. सिनकर ने अपने बयान में कहा, सुझाव दिया कि ठाणे शहर की खाड़ियों और बड़ी झीलों के किनारे पर नेचुरल बहाव का एहसास देने वाले स्थाई, आधुनिक और कृत्रिम विसर्जन लेक बनाए जाने चाहिए। उन्होंने बताया कि मसुदा तालाब में ‘दत्ता घाट’ की तरह सुरक्षित, अच्छी सुविधाओं वाली और इको-फ्रेंडली सुविधाएं बनाकर भक्तों की आस्था का सम्मान करते हुए पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है।विदित है कि ठाणे में कृत्रिम रूप से बनाए गए विसर्जन घाटों की हालत बहुत ही खस्ता होती है।न उनमें साफ सफाई का ध्यान रखा जाता है।प्लास्टिक की परत चढ़ा कर गड्ढों को भर कर पानी भर दिया जाता है।इनमें विग्रह भी ठीक प्रकार से समाते भी नहीं है।मच्छरों और हानिकारक कीड़ों को मारने के लिए कोई भी जंतु नाशक दवा का छिड़काव भी नहीं किया जाता है। मूर्तियों को भी सम्मानजनक ढंग से विसर्जित नहीं किया जाता है। टीएमसी कर्मचारी सिर्फ औपचारिकता पूरी करते हैं।इस तरह प्रतिमा विसर्जन से पहले आस्था का विसर्जन हो जाता है।बताया जाता है कि यह भी मुद्दा फिर से उठाया गया है कि हर साल अस्थाई झीलों पर करोड़ों रुपये खर्च करने से बचने और स्थाई उपायों से प्रशासन पर आर्थिक और तकनीकी दबाव कम होगा। पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए सरकार का नीतिगत स्तर पर दखल देना ज़रूरी बताते हुए, डॉ. सिन कर ने मुख्यमंत्री लेवल पर इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देने की मांग की है।
इस बीच, पर्यावरण विशेषज्ञ का मानना है कि प्रगति और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर गणेशोत्सव जैसी धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराओं को एक स्थिर दिशा देना समय की ज़रूरत है। ताकि श्रद्धालुओं की आस्था को सम्मानित किया जा सके।
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा

