मप्र के उज्जैन में नगर पूजा शुरू, 40 मंदिरों में चढ़ेगा मदिरा का भोग
-चौबीस खंबा मंदिर में महामाया-महालया की पूजा के बाद 26 किमी की यात्रा पर निकला शासकीय दल, रात में हांडी फोड़कर होगा समापन
उज्जैन, 19 अक्टूबर (हि.स.)। शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी पर मध्य प्रदेश के उज्जैन में सदियों पुरानी नगर पूजा की परंपरा सोमवार को निभाई जा रही है। सुबह चौबीस खंबा माता मंदिर में महामाया और महालया माता की पूजा-अर्चना के साथ अनुष्ठान की शुरुआत हुई। इसके बाद ढोल-नगाड़ों के साथ शासकीय नगर पूजा दल शहर के करीब 40 देवी, भैरव और हनुमान मंदिरों में पूजन के लिए रवाना हुआ। करीब 26 किलोमीटर की इस यात्रा में परंपरा के अनुसार देवी और भैरव मंदिरों में मदिरा का भोग लगाया जाएगा, जबकि हनुमान मंदिरों में ध्वजा अर्पित की जाएगी। रात करीब 8 बजे अंकपात क्षेत्र स्थित हांडी फोड़ भैरव मंदिर में हांडी फोड़ने के साथ नगर पूजा का समापन होगा।
नगर पूजा को उज्जैन की ऐतिहासिक धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। लोक मान्यता के अनुसार, यह अनुष्ठान नगर को अनिष्ट, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने तथा नागरिकों की सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान के साथ शहर की परिक्रमा भी होती है।
चौबीस खंबा मंदिर में पूजा के बाद शुरू हुई यात्रा
सोमवार सुबह करीब 8 बजे चौबीस खंबा माता मंदिर में कलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने महामाया और महालया माता की पूजा-अर्चना की। माता को मदिरा अर्पित करने के साथ आरती की गई। परंपरा के अनुसार, सोलह शृंगार की सामग्री, चुनरी और बलबाकल का भोग भी लगाया गया। पूजन के बाद शासकीय दल ढोल-नगाड़ों के साथ निर्धारित मार्ग पर निकल पड़ा। नगर पूजा को परंपरागत रूप से तांत्रिक स्वरूप का अनुष्ठान माना जाता है। यात्रा के दौरान दल विभिन्न मंदिरों में रुककर विधि-विधान से पूजा करता है। मंदिरों में आरती और भोग अर्पित करने के बाद यात्रा अगले पड़ाव की ओर बढ़ती है। कई स्थानों पर नगरवासी भी यात्रा दल का स्वागत करते हैं।
40 मंदिरों में पूजन, हांडी से बहती है मदिरा की धार
नगर पूजा के दौरान चामुंडा माता, भूखी माता, कालभैरव, चंड-मुंड नाशिनी सहित शहर के करीब 40 मंदिरों में पूजन किया जाता है। परंपरा के अनुसार, मिट्टी की हांडी से मदिरा की धार बहाते हुए यात्रा आगे बढ़ती है। देवी और भैरव मंदिरों में मदिरा अर्पित की जाती है, जबकि हनुमान मंदिरों में ध्वजा चढ़ाई जाती है। करीब 26 किलोमीटर का मार्ग तय करने के बाद यात्रा गढ़कालिका माता मंदिर में पूजन के पड़ाव से आगे बढ़ती है। इसके बाद अंकपात क्षेत्र स्थित हांडी फोड़ भैरव मंदिर में हांडी फोड़कर अनुष्ठान पूरा किया जाता है। इस परंपरा में धार्मिक मान्यताओं के साथ उज्जैन की स्थानीय संस्कृति और लोक-आस्था की झलक दिखाई देती है।
प्रशासन जुटाता है मदिरा और पूजन सामग्री
नगर पूजा की व्यवस्थाएं जिला प्रशासन और राजस्व विभाग के सहयोग से की जाती हैं। पूजन सामग्री की व्यवस्था देखने वाले पटवारी भगवान सिंह यादव के अनुसार, अनुष्ठान के लिए करीब 45 तरह की सामग्री जुटाई जाती है। इसकी तैयारी दो दिन पहले शुरू हो जाती है। चौबीस खंबा माता मंदिर के पास एक दिन पहले काले चने और गेहूं उबालकर करीब 35 किलो बलबाकल तैयार किया जाता है। इसके साथ पूड़ी और भजिए भी बनाए जाते हैं। अष्टमी की सुबह करीब 6 बजे तक पूजन सामग्री तैयार कर ली जाती है।
पूजा में इस्तेमाल होने वाली मदिरा के लिए करीब एक सप्ताह पहले एसडीएम कार्यालय से आबकारी विभाग को पत्र भेजा जाता है। इसके बाद विभाग की ओर से पूजन के लिए 30 बोतल मदिरा निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है। राजस्व विभाग के सहयोग से आयोजित इस पूजा का खर्च करीब 18 हजार रुपए बताया गया है। व्यवस्था में पटवारी, कोटवार, कस्बा पटेल और अन्य संबंधित कर्मचारी शामिल रहते हैं।
सात प्रमुख मंदिरों में चढ़ते हैं सोलह शृंगार के सेट
नगर पूजा के दौरान कुछ प्रमुख देवी मंदिरों में अन्य पूजन सामग्री के साथ सोलह शृंगार के सेट भी अर्पित किए जाते हैं। इनमें चौबीस खंबा माता मंदिर, चौंसठ योगिनी, नगरकोट महारानी, चामुंडा देवी, पद्मावती देवी, बहादुरगंज और गढ़कालिका मंदिर शामिल हैं। नगर पूजा से जुड़ी लोक मान्यताओं में लाल कपड़े का भी विशेष महत्व बताया जाता है। मान्यता है कि इस कपड़े को घर में बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए बांधा जाता है। यह परंपरा स्थानीय धार्मिक विश्वासों और पीढ़ियों से चली आ रही लोक-आस्था का हिस्सा है।
हरसिद्धि मंदिर में भी होगा शासकीय पूजन
चौबीस खंबा मंदिर में पूजा के बाद दोपहर करीब 12 बजे हरसिद्धि माता मंदिर में जिला प्रशासन की ओर से शासकीय पूजन किया जाता है। यहां माता हरसिद्धि की पूजा-अर्चना कर शृंगार सामग्री अर्पित की जाती है। महाअष्टमी पर शहर के कई घरों में भी कुलदेवी की पूजा की जाती है। उज्जैन की नगर पूजा में धार्मिक अनुष्ठान, प्रशासनिक सहभागिता और स्थानीय परंपराएं एक साथ नजर आती हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे

