200 वर्ष पहले ही 'उदन्त मार्त्तण्ड' ने तय कर दिया था पत्रकारिता का नैरेटिव : आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण
भोपाल, 08 मई (हि.स.)। पंडित युगलकिशोर शुक्ल जी ने 200 वर्ष पहले एक ही पंक्ति हिंदुस्तानियों के हित के हेत लिखकर सदियों के लिए पत्रकारिता का नैरेटिव तय कर दिया था। यह विचार शुक्रवार को हनुमत निवास, अयोध्या के आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने भोपाल में व्यक्त किया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के संस्थान हैं, लेकिन मनुष्य बनाने के संस्थान कहाँ हैं? यह संस्थान परिवार थे, जिसे हमने कमजोर कर दिया है। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने के प्रसंग पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और वीर भारत न्यास की संयुक्त पहल पर आयोजित तीन दिवसीय समारोह 'प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड' का आयोजन भारत भवन में किया जा रहा है। इसी कार्यक्रम के अंतर्गत एक विशेष सत्र 'उत्तिष्ठ भारत' में आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने उपस्थित विद्यार्थियों एवं अन्य लोगों की जिज्ञासाओं का समाधान किया।
इस अवसर पर आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने कहा कि मनुष्य निर्माण की सबसे मजबूत प्रगोगशाला परिवार है। आज यह प्रयोगशाला कुछ शिथिल हुई है। परस्पर विश्वास और संवाद कम हो गया है। यह इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने लिए कुछ नहीं सीखा है बल्कि बाजार में बेचने के लिए अपने को तैयार किया है। उन्होंने कहा कि जिन संस्थाओं और व्यवस्थाओं ने हमें तैयार किया है, बाजार ने उनके प्रति अविश्वास का भाव पैदा कर दिया है। इसके लिए तर्क दिया है कि जीवन मूल्यों में यह कमी जेनरेशन गैप के कारण है। आचार्य ने कहा कि एक भ्रांति आई है कि सफलता पाने के लिए सिद्धांतों के मार्ग को छोड़ना पड़ता था। इस भ्रांति से बाहर निकलने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सही-गलत होने से या तर्कों से परिवार नहीं चलता है। संबंध निभाने के भाव से ही परिवार चलते हैं। इसी में मनुष्यत्व का निर्माण होता है।
'प्रेम क्या है' इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य जी ने कहा कि प्रेम भोग नहीं है। हम जिस प्रेम के लिए अपने माता-पिता से विद्रोह करते हैं, उस संदर्भ में हमें याद करना चाहिए कि वर्षों तक माता-पिता ने बिना किसी अपेक्षा के हमें प्रेम दिया है। यहां तक कि हमारे जन्म से पूर्व से ही माता-पिता हमें प्रेम देते हैं। ऐसे माता-पिता अपने बच्चे के प्रेम में बाधा कैसे बन सकते हैं? दरअसल वे जानते हैं कि आप जिस प्रेम में हैं, वह प्रेम नहीं, भोग है। माता-पिता अपने अनुभव के आधार पर बच्चों का भला-बुरा अच्छे से जानते हैं। आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने स्पष्ट किया कि राम ने कभी सीता को अपने से अलग नहीं किया। राम और सीता, दोनों एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते। रामजी के पुरखे एक से अधिक पत्नी रखते थे लेकिन रामजी ने केवल सीता जी को ही अपने जीवन में स्थान दिया। जब उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया तब भी सीता जी की प्रतिमा को साथ रखकर आहुतियां दीं। इसके साथ ही रामायण के अन्य प्रसंगों का उल्लेख करके आचार्य ने सिद्ध किया कि राम ने सीता का परित्याग नहीं किया। हमें इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए।
उन्होंने आग्रह किया कि हमें फिल्मों और सीरियल से अपने धर्म को, ग्रंथों को और कहानियों को समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए। अपने धर्म को समझने के लिए हमें मूल ग्रंथ पढ़ने चाहिए। युवा को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि युवा होने अर्थ यह नहीं होता कि मूंछें आ गईं। युवा होने का अर्थ है अपनी आग को संभालने की शक्ति आ जाना। अगर युवा में अपनी ऊर्जा को पहचानने का सामर्थ्य आ गया तो वह धरती पर जहां कहीं रहेगा, उजाला ही बेखेरेगा।
अयोध्या के हनुमत निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनीशरण ने कहा कि दो शताब्दी पहले एक मनीषी ने एक चिंता व्यक्त की उसका प्रतीक है उदन्त मार्त्तण्ड। उनके मन में आया कि हमारे संवाद बाहरी भाषा में क्यों हो, मातृभाषा में क्यों नहीं? अपनी भाषा और उससे बनते संवाद में पंडित युगलकिशोर शुक्ल ने 'हिंदुस्तानियों के हित के हेत' के रूप में पत्रकारिता को पहचाना था।
उन्होंने 'उदन्त मार्त्तण्ड' शीर्षक को स्पष्ट करते हुए बताया कि 'उदन्त' यानी समाचार और 'मार्त्तण्ड' यानी सूर्य। जैसे सूर्योदय बिना सोए लोग नहीं जागते, वैसे ही यह हिंदी का पहला पत्र समाज को जगाने के लिए 'अखंड भारत' के भाव से शुरू हुआ था। उन्होंने कहा कि पत्रकार कोई भविष्यवक्ता या केवल पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर नहीं है, बल्कि वह समाज का 'निष्प्रिय और तत्वज्ञ वैद्य' है, जो समाज की नाड़ी पहचानता है। नैरेटिव की शक्ति पर आचार्य ने कहा कि शुक्ल जी ने पहली ही पंक्ति में हिंदुस्तानियों के हित के हित लिखकर सदियों के लिए पत्रकारिता का नैरेटिव तय कर दिया था।
कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के इस प्रसंग पर हम पंडित युगलकिशोर शुक्ल और हिंदी पत्रकारिता को याद करेंगे। आज की भाषा में जिसे नैरेटिव सेट करना कहते हैं उस दृष्टि से पंडित युगलकिशोर शुक्ल ने आज से 200 वर्ष पहले ही पत्रकारिता का नैरेटिव सेट कर दिया था- हिंदुस्तानियों के हित के हेत। यह ध्येय वाक्य बताता है कि समाचारपत्र क्यों प्रकाशित होने चाहिए।
भारत सरकार के पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने पत्रकारिता के इतिहास और वर्तमान ध्रुवीकरण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता से पहले पत्रकारिता एक 'मिशन' थी। आज के दौर में पत्रकार को लेफ्ट या राइट की विचारधारा से ऊपर उठकर 'नेशन फर्स्ट' (राष्ट्र प्रथम) के सिद्धांत पर सत्य को प्रदर्शित करना चाहिए।
लेखक एवं प्राध्यापक डॉ. सी. जयशंकर बाबू ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की 200 वर्ष की यात्रा में, दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता के 130 वर्ष की साझेदारी है। हिंदी पत्रकारिता का शुभारंभ गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र से हुआ है। इसी प्रकार, भारतीय हिंदी साहित्य का शुभारंभ दक्षिण भारत से हुआ है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा

