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झाबुआ: हर्षोल्लास पूर्वक संपन्न हुआ गढ़ उत्सव, प्रतिभागियों के छूटे पसीने

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झाबुआ: हर्षोल्लास पूर्वक संपन्न हुआ गढ़ उत्सव, प्रतिभागियों के छूटे पसीने


झाबुआ: हर्षोल्लास पूर्वक संपन्न हुआ गढ़ उत्सव, प्रतिभागियों के छूटे पसीने


झाबुआ: हर्षोल्लास पूर्वक संपन्न हुआ गढ़ उत्सव, प्रतिभागियों के छूटे पसीने


झाबुआ, 16 मार्च (हि.स.)। मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिला मुख्यालय पर आयोजित गढ़ उत्सव सोमवार को हर्षोल्लास पूर्वक संपन्न हुआ, किंतु इस हैरतअंगेज उत्सव में भाग लेने वाले युवाओं को इस वर्ष गढ़ जीतने में बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा।

उत्सव में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे, जिन्होंने इस निराले उत्सव का मजा लिया। जनजातीय समुदाय के लोग परंपरागत वाद्य बजाते हुए गढ़ उत्सव में शामिल हुए। पुराने समय में गढ़ उत्सव का आयोजन झाबुआ के राजा द्वारा आयोजित किया जाता था, किंतु देश की आजादी के बाद नगरीय परिषद द्वारा इसे प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि के दिन आयोजित किया जाता है।

चैत्र कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि पर आयोजित होने वाले जनजातीय समुदाय के परंपरागत धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व के गढ़ उत्सव का आयोजन आज सोमवार देर शाम को जनजातीय परंपरा के अनुसार संपन्न हुआ। आयोजन में सबसे पहले समुदाय के सदस्यों द्वारा धार्मिक परंपरानुसार गल देवता की पूजा की गई। जिला मुख्यालय के राजबाड़ा चोक के बीचोबीच आयोजित होने वाला यह उत्सव आदिवासी समुदाय के युवाओं का खास उत्सव है, जिसमें सफलता मिलने पर उसे समुदाय द्वारा सम्मानित नजरों से देखा जाता है।

गढ़ के रूप में स्थानीय नगर पालिका परिषद द्वारा करीब 35 फीट ऊंची एक बल्ली को राजबाड़ा चोक के बीचोबीच गाड़ दिया जाता है, जिस पर हल्दी और तेल का लेप चढ़ाया जाता है। इसके ऊपरी भाग में अब एक रस्सी भी बांधी जाने लगी है, जिसके सहारे प्रतिभागी उस बल्ली के सबसे ऊपरी तक हिस्से तक पहुंचता है, ओर वहां पर बंधी गुड़ की पोटली को उतार लेता है। उत्सव में विजेता होंने के लिए जरूरी होता है कि प्रतिभागी उस पोटली तक पहुंचे, ओर उसमें रखी गुड़ की मिठाई ऊपर से गिराकर सबको बांटे। वस्तुत: गढ़ उत्सव हर्षोल्लास के वातावरण में जीत के आनंद को सबके साथ बांटना है। उत्सव में भाग लेने वाला युवक जब गढ़ चढ़ना शुरू करता है, तब उसके स्वजन संबंधी अपनी खुशियो की अभिव्यक्ति करते हुए परंपरागत वाद्य ढोल, मांदल और थाली बजाते हुए गढ़ परिक्रमा करते जाते हैं, साथ हीअपनी खुशियों का इजहार करते हुए खुराकी भरने लगते हैं।

पुराने समय में गढ़ उत्सव का आयोजन झाबुआ के राजा द्वारा आयोजित किया जाता था, किंतु देश की आजादी के बाद नगरीय परिषद द्वारा इसे प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि को आयोजित किया जाता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा