अशोकनगरः सिस्टम की पोस्टमार्टम करती तस्वीर, 40 डिग्री तापमान में घंटों पड़ा रहा किशोरी का शव
अशोकनगर,03 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में एक हृदय विदारक घटनाक्रम घटित हुआ। जब पारा 40 डिग्री सेल्सियस पार कर जाए और जमीन भट्टी की तरह तपने लगे, तब एक आम इंसान छांव तलाशता है। लेकिन बहादुरपुर कस्बे में एक बेबस आदिवासी परिवार अपने घर की लाडली का शव चादर में लपेटकर घंटों तक इसी तपती धूप में खड़ा रहा। यह दृश्य आधुनिक भारत के उस चेहरे को उजागर करता है, जहां कागजों पर तो एम्बुलेंस दौड़ती हैं, लेकिन जमीन पर गरीब के हाथ सिर्फ इंतजार ही आता है।
जब रक्षक ही संवेदनहीन हो गए:
शनिवार शाम को एक आदिवासी किशोरी का शव उसके घर में फंदे पर लटका मिला। पुलिस और तहसीलदार की मौजूदगी में शव को पोस्टमार्टम के लिए बहादुरपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। चूंकि रात हो चुकी थी, इसलिए शव को वहीं सुरक्षित रखने की बात कही गई। लेकिन असल परीक्षा तो अभी शुरू होनी थी।
नरक जैसा पोस्टमार्टम गृह: जिस कमरे में शव रखा गया, उसके चारों ओर गंदगी, झाडिय़ां और नालियों का गंदा पानी जमा था। परिजनों को पूरी रात जागकर शव की रखवाली करनी पड़ी ताकि आवारा कुत्ते और चूहे उसे नुकसान न पहुंचा सकें।
3.5 घंटे का अंतहीन इंतजार: रविवार सुबह पोस्टमार्टम के बाद परिजनों ने 112 हेल्पलाइन, पुलिस और जिला अस्पताल के शव वाहन को फोन किया। निजी ऑटो वालों से भी मिन्नतें कीं, लेकिन साड़ तीन घंटे तक कोई मदद नहीं मिली।
पत्रकार आदित्य त्रिवेदी ने दिखाई संवेदनशीलता:
हाथों में बोझ और पैरों में छाले: जब कोई रास्ता नहीं बचा, तो भाई और बहनोई अपनी बहन के शव को हाथों में उठाकर ही निकल पड़े। करीब 200 मीटर तक वे इसी तरह तपती सडक़ पर चलते रहे, जिसके बाद स्थानीय पत्रकार आदित्य त्रिवेदी ने संवेदनशीलता दिखाते हुए अपनी कार से शव को घर पहुंचाया।
प्रशासनिक लापरवाही के गंभीर सवाल:
नियमों की धज्जियां उस समय देखने में आईं जब कि बालिका की संदिग्ध मौत के मामले में मौके पर महिला पुलिसकर्मी का होना अनिवार्य है, लेकिन परिजनों के अनुसार वहां केवल पुरुष स्टाफ मौजूद था।
सुविधाओं का अभाव: पोस्टमार्टम कक्ष से बाहर तक शव लाने के लिए न स्ट्रेचर मिला और न ही वार्डबॉय। परिजनों को खुद शव उठाना पड़ा।
जिम्मेदारी का खेल: डॉक्टर कह रहे हैं कि शव घर पहुंचाने की जिम्मेदारी पुलिस की है, जबकि पुलिस और हेल्पलाइन सेवाओं ने ऐन वक्त पर हाथ खड़े कर दिए।
वहीं मामले को लेकर डॉ. यशवंत सिंह तोमर, सेक्टर मेडिकल का कहना है कि ‘पोस्टमार्टम वाले मामलों में शव को अस्पताल तक लाने, उसकी सुरक्षा करने, पोस्टमार्टम कराने एवं पोस्टमार्टम उपरांत शव को घर तक पहुंचाने की व्यवस्था पुलिस की होती है। हमारे अस्पताल में शव वाहन नहीं है, जिला अस्पताल से शव वाहन बुलाने के प्रयास कई बार किए हैं जो असफल साबित हुए।
हिन्दुस्थान समाचार / देवेन्द्र ताम्रकार

