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उज्जैनः राष्ट्रीय हास्य नाट्य समारोह में हुई‘ताक धिना धिन’ की प्रस्तुति

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उज्जैनः राष्ट्रीय हास्य नाट्य समारोह में हुई‘ताक धिना धिन’ की प्रस्तुति


उज्जैन, 29 मार्च (हि.स.)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय हास्य नाट्य समारोह के प्रथम दिन रविवार शाम कालिदास संस्कृत अकादमी के अभिरंग नाट्य गृह में ‘ताक धिना धिन’ की रंगारंग प्रस्तुति हुई।

इस नाट्य समारोह का उद्देश्य समाज की विसंगतियों, मानवीय संबंधों और समकालीन परिस्थितियों पर विचार करने के लिए दर्शकों को प्रेरित करना है। समारोह के प्रथम दिवस नाटक ‘ताक धिना धिन’ का मंचन विशाल कुशवाह के निर्देशन में हुआ। प्रस्तुत नाटक ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। शहर के ख्यात नाटककार सतीश दवे द्वारा रचित इस नाटक ने पूरे सभागार को हँसी और आनंद से सराबोर कर दिया।

नाटक की कहानी, मुख्य पात्र सुखू के इर्द-गिर्द घूमती है जो अपने दोस्तों के साथ बेफिक्र जीवन जी रहा होता है। तभी अचानक उसके चाचा, जो पूर्व सैनिक हैं, उससे मिलने आ जाते हैं और अपनी बहू तथा पोते से मिलने की इच्छा जाहिर करते हैं। इस स्थिति से घबराकर सुखू अपने मित्रों और नौकर की मदद से एक युवती को अपनी पत्नी के रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनाता है। यह योजना जल्द ही उलझनों में बदल जाती है। जब हालात ऐसे बनते हैं कि एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग युवतियाँ उसकी पत्नी् बनकर सामने आ जाती हैं। इसके बाद शुरू होता है हास्य, भ्रम और रोचक घटनाओं का सिलसिला, जो अंत तक दर्शकों को हँसी से लोटपोट करता रहता है।

नाटक की खासियत यह रही कि इसमें हास्य केवल परिस्थितियों तक सीमित नहीं था, बल्कि संवादों और चरित्रों के माध्यम से भी निरंतर बना रहा। झूठ पर आधारित रिश्तों और परिस्थितिजन्य मजबूरियों को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया गया, जिससे दर्शक पूरी तरह कहानी से जुड़ गए।

अभिनय की बात करें तो सुखू की भूमिका में अनंत वर्मा ने प्रभावशाली और स्वाभाविक अभिनय किया। चाचा के किरदार में वीरेंद्र नाथानियल ने अनुशासन और संवेदनशीलता का सुंदर मिश्रण प्रस्तुत किया। झमकू के रूप में देवेंद्र दुबे, बंटी के रूप में कुशाग्र सिंह और फुन्दी के किरदार में अक्षिता राठौर ने अपनी जीवंत प्रस्तुति दी। महिला पात्रों में चंदा के रूप में रेवा पंडित, आनंदी की भूमिका में आर्यन परमार तथा रीता के रूप में वैष्णवी सोलंकी ने अपनी भूमिकाओं को प्रभावी ढंग से निभाया।

निर्देशक विशाल सिंह कुशवाह ने नाटक की गति, प्रस्तुति और हास्य संतुलन को कुशलता से संभालते हुए इसे एक सशक्त भाव से रूपांतरित किया। मंच सज्जा, वेशभूषा और प्रकाश व्यवस्था ने भी कथा को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सतीश दवे की यह रचना दर्शाती है कि हास्य रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिस्थितियों और मानवीय कमजोरियों को सहज और प्रभावशाली ढंग से सामने लाने का माध्यम भी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / ललित ज्‍वेल