एमसीयू में जेन जी के लिए विशेष व्याख्यान, गीता उपदेश नहीं विशुद्ध ज्ञान है : डा. विजय अग्रवाल
भोपाल, 03 सितंबर (हि.स.)। कृष्ण का जेन जी से बहुत ही गहरा संबंध है। जहां तार्किकता है, उत्सव है, संतुलन है और जहां प्रेम है वहीं कृष्ण हैं। कृष्ण वहां कभी नहीं हा सकते जहां दुख है, जहां विषाद है और जहां आलस है। कृष्ण को समझना कठिन जरूर है लेकिन एक बार समझने पर हमारे जीवन में स्पष्टता आ जाती है। कृष्ण सतत वर्तमान है। एमसीयू में जेन जी के लिए गीता विषय पर अपनी बात रखते हुए प्रसिद्ध लेखक और विचारक डा. विजय अग्रवाल ने गुरूवार को कहा कि गीता को समझने के लिए कृष्ण को जानना जरूरी है। उन्होंने कहा कि गीता कोई उपदेश नहीं है बल्कि यह विशुद्ध ज्ञान है।
डॉक्टर अग्रवाल ने कहा कि तर्क कभी भी हवा में नहीं आते उनमें कुछ न कुछ तत्व निहित होता है। हर तर्क का एक उद्देश्य होता है। जेन जी के लिए उन्होंने कहा कि युवा अपने को खोल कर रखें और हर तरफ से आने वाली ज्ञान की रोशनी को वे ग्रहण करें। निश्चित तौर पर ऐसा करने से उनका व्यक्तित्व बिल्कुल अलग बनेगा। उन्होंने मन और मस्तिष्क की एकाग्रता को अनिवार्य बताया। इस अवसर पर डॉ अग्रवाल ने कहा कि कृष्ण ने सत्य का ज्ञान दिया है। आधा अधूरा सत्य आचार्य द्रोण जैसे महारथियों के भी अंत का कारण बनता है इसलिए सत्य सदैव संपूर्णता में होना चाहिए और जहां संपूर्णता है वही कृष्णा होते हैं। डॉक्टर अग्रवाल ने कहा कि गीता हमें जीवन सिखाती है।
उन्होंने कहा कि सबसे अधिक मुश्किल है शिष्य होना। शिष्य का भाव अगर हमारे भीतर होगा तो हम जीवन भर सीखते रहेंगे और जो जीवन भर सीखता रहेगा वह कभी भी असफल नहीं होगा। उन्होंने गीता को मनोविज्ञान की सबसे पहले और प्राचीन पुस्तक बताते हुए उन्होंने कहा कि हम सभी अपनी आइडेंटिटी के साथ रहे और उस पर कमांड करना सीख लें तो हम जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि जेन जी अपने लिए जरूरी कौशल अर्जित करें और उसमें दक्षता हासिल कर लें तो वे अपने जीवन को सफलता के शिखर तक ले जा सकते हैं। इस अवसर पर डा. अग्रवाल ने विद्यार्थियों के साथ प्रश्नोत्तर संवाद से उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया।
इस अवसर पर कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि जीवन की पाठशाला और प्रयोगशाला में बहुत कुछ बदलता रहता है। यह हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। हमारे अपने-अपने कुरुक्षेत्र और मथुरा होते हैं। हम सभी अगर अपना जीवन सात्विक ढंग से अपना कर्म करते हुए जिएंगे तो हम सब की निश्चित तौर पर एक द्वारका भी होगी।
उन्होंने कहा कि अगर ध्यान से देखें तो भगवान राम और कृष्ण हमारे इतिहास में ऐसे महायोगी हुए हैं जिन्होंने अनेक जगहों पर यात्राएं की और अपने-अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया। श्री तिवारी ने कहा कि जीवन की विकट यात्राओं का प्रवाह हमें समृद्ध करता है। उन्होंने कहा कि अपने-अपने कुरुक्षेत्र में रहते हुए हम अपने अपने कृष्ण को याद रखें।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा

