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शरद पूर्णिमा रविवार को, मां लक्ष्मी की आराधना और खीर का भोग लगाने का विशेष महत्व

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शरद पूर्णिमा रविवार को, मां लक्ष्मी की आराधना और खीर का भोग लगाने का विशेष महत्व


सीहोर, 24 अक्टूबर (हि.स.)। अमृत वर्षा, आरोग्य और मां लक्ष्मी की कृपा से जुड़ा पावन पर्व शरद पूर्णिमा का पर्व इस वर्ष रविवार, 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा। पंडित सुनील शर्मा के अनुसार, सनातन पंचांग और आध्यात्मिक परंपरा में वर्षभर आने वाली सभी पूर्णिमा तिथियों में शरद पूर्णिमा का विशेष और विशिष्ट महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह रात्रि आरोग्य, साधना और आंतरिक चेतना के जागरण का विशेष अवसर है। इस बार शरद पूर्णिमा तिथि रविवार सुबह 11:55 बजे से प्रारंभ होकर सोमवार सुबह 9:40 बजे तक रहेगी।

मां महालक्ष्मी की आराधना का विशेष पर्व

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात्रि मां भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष मानी जाती है। मान्यता है कि इस पावन निशा में धन-वैभव की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी अपने वाहन पर सवार होकर पृथ्वी लोक का भ्रमण करती हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस रात्रि में श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और वैभव का आगमन होता है।

चंद्रमा की सोलह कलाएं और अमृत वर्षा का आध्यात्मिक रहस्य

शरद पूर्णिमा की रात्रि का भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी शीतल चांदनी को अमृततुल्य माना जाता है। इसी विश्वास के चलते शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की परंपरा प्रचलित है।

परंपरा के अनुसार, गाय के दूध से बनी खीर को मिट्टी या अन्य स्वच्छ पात्र में रखकर खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, ताकि उस पर चंद्रमा की किरणें पड़ सकें। श्रद्धालु इसे अमृततुल्य प्रसाद मानकर ग्रहण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इस खीर को आरोग्य और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है।

शरद पूर्णिमा पर इन आध्यात्मिक उपायों का है विशेष महत्व

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार, शरद पूर्णिमा के प्रदोष काल में भगवान श्रीविष्णु, माता लक्ष्मी और गौमाता का विधिवत पूजन करना शुभ माना जाता है। इस अवसर पर गाय के दूध से बनी सफेद खीर अथवा मखाने की खीर का भोग अर्पित करने की परंपरा है।

रात्रि में कनकधारा स्तोत्र, श्रीसूक्त और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन स्तोत्रों का पाठ साधक को आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देने के साथ सुख-समृद्धि की कामना से भी जुड़ा है।

साधना, जप और ध्यान का अवसर

शरद पूर्णिमा केवल भौतिक समृद्धि की कामना का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक चेतना के जागरण का अवसर भी है। इस पावन रात्रि में अधिक से अधिक समय जप, ध्यान, भजन और साधना में व्यतीत करने की परंपरा है। श्रद्धालु इस दिन पूजा-अर्चना के साथ आत्मिक शांति, सकारात्मकता और जीवन में संतुलन की कामना करते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा