home page

सतना में कुपोषण की चुनौती बरकरार, हर महीने 100 से अधिक गंभीर बच्चे पहुंच रहे एनआरसी

 | 
सतना में कुपोषण की चुनौती बरकरार, हर महीने 100 से अधिक गंभीर बच्चे पहुंच रहे एनआरसी


सतना, 05 जून (हि.स.)। कुपोषण मुक्त जिले के दावों के बीच मध्‍य प्रदेश के सतना में बच्चों की पोषण स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। जिले के विभिन्न पोषण पुनर्वास केंद्रों (एनआरसी) में हर महीने 100 से अधिक गंभीर कुपोषित बच्चों को भर्ती कर उपचार देना पड़ रहा है, जिससे समस्या की गंभीरता उजागर हो रही है।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025-26 के दौरान जिले के विभिन्न एनआरसी में 1,396 गंभीर कुपोषित बच्चों को भर्ती किया गया। वहीं विभागीय सूत्रों का दावा है कि जिले में वर्तमान में लगभग 5,000 बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं। इनमें करीब 950 बच्चे अति गंभीर कुपोषित श्रेणी में शामिल हैं, जिन्हें विशेष पोषण और चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता है।

जिले में कुपोषण से निपटने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग की 10 परियोजनाओं के तहत 2,054 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। यहां निर्धारित मेन्यू के अनुसार बच्चों को पूरक पोषण आहार उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में बच्चों का कुपोषित बने रहना योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और कस्बाई इलाकों में भी कुपोषण के मामले सामने आ रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पोषण योजनाओं की जमीनी स्तर पर नियमित निगरानी और प्रभावी अमल की आवश्यकता है।

गंभीर कुपोषित बच्चों के उपचार के लिए जिले में कुल 70 बिस्तरों की व्यवस्था की गई है। जिला अस्पताल में 20 बिस्तरों वाला एनआरसी संचालित है, जबकि अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 10-10 बिस्तरों की सुविधा उपलब्ध है। इसके बावजूद कई ब्लॉक स्तरीय एनआरसी में बिस्तर खाली रहने की स्थिति भी सामने आती है। पिछले सत्र में एनआरसी बेड उपयोग का औसत 83 प्रतिशत दर्ज किया गया था।

जानकारों के अनुसार गंभीर कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें समय पर एनआरसी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग के मैदानी अमले की है। हालांकि निगरानी और फॉलोअप में कमी के कारण कई बच्चे समय पर उपचार नहीं पा पाते। बताया जाता है कि एनआरसी में भर्ती होने वाले करीब आधे बच्चों को उनके परिजन स्वयं अस्पताल लेकर पहुंचते हैं।

जिला कार्यक्रम अधिकारी राजीव सिंह ने बताया कि गंभीर कुपोषित बच्चों को एनआरसी में भर्ती कराने के लिए मैदानी अमले को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं और लगातार कार्रवाई भी की जा रही है। उन्होंने कहा कि कई बार बच्चों के परिजन भी एनआरसी में भर्ती कराने को लेकर सहयोग नहीं करते, जिससे चुनौती बढ़ जाती है।

कुपोषण के खिलाफ चल रही योजनाओं के बावजूद लगातार सामने आ रहे आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी प्रभावी निगरानी और समुदाय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है।

हिन्दुस्थान समाचार / हीरेन्‍द्र द्विवेदी