झाबुआ: मंगलवार को खग्रास चंद्रग्रहण; होलिका दहन फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को ही शास्त्र सम्मत
झाबुआ, 27 फ़रवरी (हि.स.)। खग्रास चंद्रग्रहण होने एवं पूर्णिमा तिथि दो होने की वजह से इस वर्ष होली पर्व मनाए जाने, होलिका दहन एवं ग्रहण काल स्पर्श के संबंध में संशय बना हुआ था, किंतु विद्वानों द्वारा शास्त्रोक्त मतों के अनुसार चंद्र ग्रहण एवं होलिका दहन के दिन और समय का युक्तियुक्त पूर्ण समाधान किया गया है।
भारतीय पंचांग के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा मंगलवार को खग्रास चंद्र ग्रहण है, जिसका स्पर्श काल प्रातः काल 9 बजकर 15 मिनट, ग्रहण काल का आरंभ 4 बजकर 35 मिनट और ग्रहण समाप्त 6 बजकर 49 मिनट है, जबकि होलिका पूजन एवं दहन सोमवार 2 मार्च संध्या काल है।
ग्रहण काल के स्पर्श, आरंभ एवं समाप्ति के संबंध में शास्त्रोंक्त जानकारी देते हुए चतुर्भुज ज्यौतिष कार्यालय के पंडित हिमांशु शुक्ल ने हिंदुस्थान समाचार को कहा कि भारतीय पंचांग के अनुसार इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि मंगलवार को खग्रास चंद्रग्रहण है। इस चंद्र ग्रहण का स्पर्श अर्थात सूतक काल प्रातः काल 9 बजकर 15 मिनट से शुरू होगा, जबकि ग्रहण काल का आरंभ 4 बजकर 35 मिनट पर हो जाएगा, जबकि ग्रहण का मध्य काल 5 बजकर 4 मिनट और 6 बजकर 49 मिनट पर ग्रहण समाप्त हो जाएगा। पंडित हिमांशु शुक्ल ने बताया कि शाम 3 बजकर 39 मिनट से शाम 6 बजकर 34 मिनट के बीच होलिका पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त है।
विद्वान पंडितों के अनुसार पूर्णिमा तिथि सोमवार 2 और मंगलवार 3 मार्च को है, ओर चूंकि पूर्णिमा तिथि का आरंभ फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष सोमवार 2 मार्च को शाम 5 बजकर 55 मिनट पर हो रहा है और मंगलवार 3 मार्च को शाम 5 बजकर 56 मिनट पर पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। इसलिए होलिका पर्व सोमवार 2 मार्च को मनाया जाना शास्त्र सम्मत है।
उक्त पर्व के संबंध में शास्त्रोंक्त मत रखते हुए पंडित प्रवीण कुमार भट्ट ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार, विधान है कि जिस दिन प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि लगती है तब होलिका दहन किया जाता है। ऐसे में होलिका दहन का पर्व 2 तारीख को ही किया जाना शास्त्र सम्मत है। परंपरागत रूप से होली के दूसरे दिन दुल्हंडी का पर्व मनाया जाता है, किंतु दूसरे दिन अर्थात 3 मार्च को चंद ग्रहण है, इसलिए उक्त ग्रहण काल में रंग खेलना या अन्य कोई शुभ कार्य निषिद्ध माना गया है, इसलिए रंगोत्सव उचित नहीं। यदि रंग होली खेलना ही हो तो 4 मार्च को खेली जा सकती है।
भट्ट ने कहा कि शास्त्रानुसार होलिका दहन भद्रा मुख में नहीं किया जाता है, ओर सोमवार 2 मार्च को संध्या काल 6 बजकर 29 मिनट से रात में 8 बजकर 58 मिनट तक प्रदोष काल रहेगा। इस दौरान भद्रा भी रहेगी, लेकिन, भद्रा मुख नहीं होगा। अतः ऐसे में 2 मार्च को ही होलिका दहन करना दोष मुक्त रहेगा। पंडित भट्ट स्पष्ट करते हुए कहा कि सोमवार 2 मार्च को भद्रा मुख मध्यरात्रि 2 बजकर 38 मिनट से अगले दिन 3 मार्च को सुबह 4 बजकर 34 मिनट तक रहेगी। अतः सोमवार 2 मार्च को ही होलिका दहन करना शास्त्र सम्मत एवं शुभ मङ्गल दायक होगा, जबकि इसी दिन शाम 3 बजकर 39 मिनट से शाम 6 बजकर 34 मिनट के बीच होलिका पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त है।
उल्लेखनीय है कि पौराणिक मान्यता अनुसार होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रहलाद जो भगवान श्री विष्णु के परम प्रिय भक्त थे। वे असुर दैत्यराज हिरण्यकश्यपु के पुत्र थे, किंतु दैत्य राज हिरण्यकश्यपु को प्रह्लाद की विष्णु भक्ति नागवार गुजर रही थी, इस हेतु उसने प्रह्लाद को मारने के लिए अनेक प्रयास किए, ओर जब कोई भी प्रयास कारगर होता हुआ नहीं दिखा तो उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाएं, क्योंकि, होलिका को प्राप्त हुए वरदान के अनुसार उसे अग्नि नहीं जला सकती थी, इसलिए वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रविष्ट हो गई, किंतु वह वरदान ही उसके लिए अभिशाप बन गया। भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा से प्रहलाद बच गए और होलिका अग्नि में भस्म हो गई। तब से ही होलिका का पूजन पूर्वक होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा

