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रीवा में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ किसानों का विरोध, ड्रिलिंग मशीनें लौटाईं

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रीवा में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ किसानों का विरोध, ड्रिलिंग मशीनें लौटाईं


रीवा, 08 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के रीवा जिले के सिरमौर क्षेत्र में प्रस्तावित टाटा पावर परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लेकर ग्रामीणों का विरोध तेज हो रहा है। रोझौही, सरई कलां सहित आसपास के गांवों के लोग परियोजना से खेती, जलस्रोतों, घरों और भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इस परियोजना का असर करीब 100 गांवों तक पड़ सकता है। जमीन की जांच के लिए ड्रिलिंग मशीनें पहुंचने के बाद विरोध सामने आया। ग्रामीणों के विरोध के चलते मशीनों को वापस लौटना पड़ा।

200 एकड़ जमीन की चर्चा, आठ स्थानों पर ड्रिलिंग की तैयारी

प्रस्तावित परियोजना के लिए करीब 200 एकड़ जमीन की बात सामने आई है। फिलहाल परियोजना शुरुआती प्रक्रिया में है और संयंत्र का निर्माण शुरू नहीं हुआ है। इसी बीच रोझौही और सरई कलां गांवों में जमीन की जांच के लिए ड्रिलिंग मशीनें पहुंचीं, जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया।

जानकारी के मुताबिक, करीब आठ स्थानों पर ड्रिलिंग की तैयारी थी। इनमें चार स्थानों पर लगभग 100 मीटर और अन्य चार स्थानों पर करीब 50 मीटर तक ड्रिलिंग किए जाने की बात कही गई। जमीन की जांच के लिए की जाने वाली ड्रिलिंग को परियोजना के निर्माण की शुरुआत नहीं माना जाता है।

परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के साथ पर्यावरणीय मंजूरी, वन संबंधी अनुमति और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की नियामकीय प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। हालांकि, शुरुआती गतिविधियों के बीच ही स्थानीय लोगों की आपत्तियां सामने आने लगी हैं।

ग्रामसभा में विरोध के बाद भी गतिविधियां होने पर सवाल

रोझौही के सरपंच कोमल सिंह के मुताबिक, प्रस्तावित परियोजना को लेकर ग्रामसभा में आपत्ति दर्ज कराई गई थी और उसके माध्यम से विरोध जताया गया था। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बावजूद जमीन से जुड़ी गतिविधियां जारी रहने की जानकारी मिलने से उनकी नाराजगी बढ़ी है।

ग्रामीण अमित वैश्य ने आरोप लगाया कि उनकी जमीन पर उनकी सहमति के बिना परियोजना से संबंधित गतिविधियां शुरू की गईं। उनका कहना है कि जमीन पर जांच या अन्य कोई गतिविधि करने से पहले संबंधित भू-स्वामियों को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।

ग्रामीणों का सवाल है कि जब ग्रामसभा में परियोजना का विरोध दर्ज कराया जा चुका है, तो इसके बावजूद जमीन की जांच और टैगिंग क्यों की जा रही है। उनका कहना है कि जमीन से जुड़ी किसी भी प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की आपत्तियों और भूमि मालिकों की चिंताओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

छह साल की मेहनत से बनाया घर, अब फिर उजड़ने की चिंता

प्रस्तावित परियोजना को लेकर ग्रामीणों की चिंता केवल खेती की जमीन तक सीमित नहीं है। उन्हें अपने घरों पर भी संभावित असर की आशंका सता रही है। कुछ परिवारों के मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने हैं, जबकि कई लोगों ने मजदूरी और वर्षों की बचत से अपने घर तैयार किए हैं।

ग्रामीण ममता प्रजापति ने बताया कि पहले कच्चे घर में रहना मुश्किल होता था, खासकर बारिश के दौरान परिवार को काफी परेशानी होती थी। परिवार की रोजाना मजदूरी करीब 500 रुपये थी। इसी कमाई में से धीरे-धीरे पैसे बचाकर उन्होंने लगभग छह साल में अपना घर बनाया।

ममता प्रजापति के मुताबिक, अब जमीन की टैगिंग और परियोजना की चर्चा के बाद परिवार को दोबारा घर को लेकर चिंता होने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि मकान बनाने में उनकी वर्षों की मेहनत और बचत लगी है। यदि परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहित की जाती है, तो उसका असर केवल भूमि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खेती और परिवारों के आवास भी प्रभावित हो सकते हैं।

खेती, पानी और भविष्य को लेकर ग्रामीण चिंतित

ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित संयंत्र को लेकर उनकी आपत्ति का प्रमुख कारण जमीन, खेती, पानी और आवास पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव हैं। उनका दावा है कि परियोजना का दायरा आसपास के अनेक गांवों तक असर डाल सकता है। इसी आशंका के चलते शुरुआती जांच गतिविधियों के दौरान ही लोगों ने विरोध दर्ज कराया है।

फिलहाल, सिरमौर क्षेत्र में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लेकर ग्रामीणों की आपत्तियां सामने आ रही हैं। परियोजना अभी शुरुआती प्रक्रिया में है और निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में जमीन की जांच, ग्रामसभा की आपत्तियों और ग्रामीणों की चिंताओं को लेकर आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हिन्दुस्थान समाचार / हीरेन्‍द्र द्विवेदी