रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्लांट के साये में गांवों की जिंदगी बेहाल, जमीन गई पर रोजगार और सुविधाओं का इंतजार
रीवा, 21 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के रीवा जिले के गुढ़ क्षेत्र स्थित बदवार पहाड़ पर 750 मेगावाट क्षमता का अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्लांट देश की प्रमुख सौर ऊर्जा परियोजनाओं में अपनी पहचान बना चुका है। यहां पैदा होने वाली बिजली का एक हिस्सा दिल्ली तक पहुंचता है और इसी बिजली से दिल्ली मेट्रो की ट्रेनें भी संचालित होती हैं। दूसरी ओर, परियोजना से लगे गांवों में रहने वाले लोगों का कहना है कि जिस क्षेत्र की जमीन पर देश के लिए ऊर्जा का बड़ा केंद्र खड़ा हुआ, वहां के ग्रामीण आज भी बिजली कटौती, रोजगार की कमी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं।
बदवार पहाड़ की तस्वीर भी अब पूरी तरह बदल चुकी है। कभी भारतीय सेना के युद्धाभ्यास और तोपों की गूंज से पहचाने जाने वाले इस इलाके में आज दूर तक सोलर पैनलों की कतारें दिखाई देती हैं। आधुनिक तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा के बड़े उदाहरण के तौर पर देखे जाने वाले इस प्लांट से क्षेत्र को नई पहचान मिली है, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि परियोजना के प्रत्यक्ष लाभ उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप उन तक नहीं पहुंच पाए हैं।
सोलर पावर परियोजना के लिए करीब 1590 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था। जमीन देने वाले किसानों को उस समय मुआवजे और रोजगार के अवसर मिलने की उम्मीद थी। ग्रामीणों के मुताबिक जमीन का एकमुश्त मुआवजा जरूर मिला, लेकिन इससे उनकी लंबे समय की आजीविका की भरपाई नहीं हो सकी। खेती पर निर्भर कई परिवारों के सामने जमीन जाने के बाद आय का स्थायी साधन जुटाने की चुनौती खड़ी हो गई।
बताया गया है कि बरसैता देश, इटार पहाड़, दुआरी, तमरा, जल्दर, बदवार और मनिकवार सहित आसपास के गांवों के किसानों की निजी जमीन परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई। ग्रामीणों का कहना है कि खेती की जमीन चली जाने के बाद परिवारों की आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं रही। उनके मुताबिक परियोजना आने से क्षेत्र में रोजगार और विकास की जो उम्मीद जगी थी, वह पूरी तरह साकार नहीं हो सकी।
स्थानीय युवाओं का आरोप है कि सोलर परियोजना में स्थायी और तकनीकी पदों पर क्षेत्र के बाहर के जिलों और राज्यों के लोगों को अवसर मिला, जबकि स्थानीय युवाओं को मुख्य रूप से सुरक्षा गार्ड, घास कटाई और दूसरे अस्थायी कार्यों तक सीमित रखा गया। ग्रामीणों का कहना है कि कई लोगों को करीब 12 घंटे की ड्यूटी करनी पड़ती है, लेकिन इसके बदले मिलने वाला वेतन सीमित है।
युवाओं का कहना है कि यदि परियोजना क्षेत्र के स्थानीय लोगों को तकनीकी प्रशिक्षण देकर उन्हें स्थायी रोजगार उपलब्ध कराया जाता तो जमीन देने वाले परिवारों के लिए यह परियोजना आर्थिक सहारा बन सकती थी। फिलहाल कई स्थानीय परिवारों को लगता है कि परियोजना के बड़े आकार के अनुपात में उनके लिए रोजगार के अवसर नहीं बने हैं।
रीवा का अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्लांट 250-250 मेगावाट की तीन इकाइयों में विकसित किया गया है। इस तरह इसकी कुल स्थापित क्षमता 750 मेगावाट है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां उत्पादित बिजली का करीब 24 प्रतिशत हिस्सा दिल्ली मेट्रो को उपलब्ध कराया जाता है, जबकि शेष बिजली मध्य प्रदेश की विद्युत वितरण कंपनियों को दी जाती है।
देश की राजधानी तक बिजली पहुंचाने वाली इस परियोजना को लेकर क्षेत्र के ग्रामीणों के बीच यही सवाल सबसे ज्यादा उठ रहा है कि जिस परियोजना से इतनी बड़ी मात्रा में बिजली पैदा हो रही है, उसके आसपास रहने वाले गांवों को अपने स्तर पर पर्याप्त सुविधाएं क्यों नहीं मिल पा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना की वजह से क्षेत्र की पहचान तो बदली, लेकिन स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया।
प्लांट में काम करने वाले स्थानीय सुरक्षा गार्ड भी अपनी कार्य परिस्थितियों को लेकर परेशान होने की बात कहते हैं। उनका कहना है कि सोलर पावर प्लांट का क्षेत्र काफी विस्तृत है, लेकिन चारों ओर पर्याप्त सड़क संपर्क नहीं है। कई स्थानों पर ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर पैदल सर्चिंग करनी पड़ती है। ऐसे में सुरक्षा ड्यूटी करने वाले कर्मचारियों के सामने हमेशा जोखिम बना रहता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार प्लांट की सुरक्षा में बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं, लेकिन उनके लिए बेहतर आवागमन और ड्यूटी से जुड़ी सुविधाओं की कमी महसूस होती है। उनका कहना है कि यदि परियोजना प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की ओर से आसपास के गांवों के लिए सड़क, रोजगार और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाए तो परियोजना का लाभ स्थानीय आबादी तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकता है।
रीवा का अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्लांट स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में मध्य प्रदेश की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में शामिल है। हजारों सोलर पैनलों से घिरा बदवार क्षेत्र आज देश में सौर ऊर्जा उत्पादन की चर्चा में आता है। लेकिन परियोजना के आसपास बसे गांवों की समस्याएं यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि बड़े औद्योगिक और ऊर्जा प्रोजेक्ट के विकास का लाभ स्थानीय समुदाय तक किस तरह पहुंचे।
ग्रामीणों की मांग है कि जिन परिवारों ने परियोजना के लिए अपनी जमीन दी, उनके परिवारों के युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर स्थायी रोजगार उपलब्ध कराया जाए। साथ ही स्थानीय स्तर पर सड़क, बिजली और अन्य जरूरी सुविधाओं का विस्तार किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि देश के लिए स्वच्छ ऊर्जा पैदा करने वाली परियोजना के आसपास रहने वाले लोगों को भी विकास की रोशनी का वास्तविक लाभ मिलना चाहिए।
परियोजना से जुड़े स्थानीय ग्रामीणों की शिकायतों और रोजगार से जुड़े सवालों को लेकर जब परियोजना से संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेने का प्रयास किया गया तो वे इस मामले में कुछ भी स्पष्ट बताने को तैयार नहीं हुए। अधिकारियों का कहना था कि इस संबंध में संबंधित अधिकारियों से बात की जाए। उनका यह भी कहना था कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।
हिन्दुस्थान समाचार / हीरेन्द्र द्विवेदी

