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विंध्य में कम बारिश से धान की खेती प्रभावित, दलहन-तिलहन फसलों की ओर बढ़ा किसानों का रुझान

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विंध्य में कम बारिश से धान की खेती प्रभावित, दलहन-तिलहन फसलों की ओर बढ़ा किसानों का रुझान


रीवा, 06 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश के रीवा संभाग सहित पूरे विंध्य क्षेत्र में जून और जुलाई के दौरान सामान्य से कम वर्षा का असर खरीफ फसलों पर साफ दिखाई देने लगा है। अल्प वर्षा के कारण संभाग के छह जिलों में प्रमुख खरीफ फसल धान की बोनी प्रभावित हुई है। कृषि विभाग को इस वर्ष धान के रकबे में औसतन करीब 10 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका है, जिससे विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों की चिंता बढ़ गई है।

रीवा संभाग के रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, मैहर और मऊगंज जिलों में इस बार धान की बोनी 80 प्रतिशत के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच सकी है। दूसरी ओर, मौसम की परिस्थितियों को देखते हुए किसानों ने कम पानी में तैयार होने वाली दलहनी और तिलहनी फसलों की ओर रुख किया है। इसके चलते तिल, उड़द, मूंग और अरहर जैसी फसलों का रकबा लगभग 15 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। इन फसलों की बोनी सभी छह जिलों में लगभग पूरी हो चुकी है।

कृषि विज्ञान केंद्र, मझगवां के पौध सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश जांगड़े ने बताया कि अल नीनो के प्रभाव की आशंका को देखते हुए जून माह में ही किसानों के लिए परामर्श जारी किया गया था। इसमें कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती अपनाने की सलाह दी गई थी। उन्होंने बताया कि कई किसानों ने समय रहते इस सलाह का पालन किया, जिससे दलहन और तिलहन फसलों का दायरा बढ़ा है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार विंध्य क्षेत्र में वर्षा का असमान वितरण कृषि के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा करता है। यहां खरीफ की लगभग 70 से 80 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में पर्याप्त और समय पर बारिश नहीं होने का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ फसलों की बेहतर पैदावार के लिए 25 जून से 31 जुलाई तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस अवधि में पर्याप्त वर्षा नहीं होने से धान की बोनी प्रभावित हुई है और अब इस कमी की भरपाई कठिन मानी जा रही है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023 के बाद विंध्य क्षेत्र में अल्प वर्षा की यह दूसरी स्थिति बनी है। राज्य में मानसून का आधिकारिक मौसम 1 जून से 30 सितंबर तक माना जाता है और इसी दौरान खरीफ फसलों की बुआई का अधिकांश कार्य पूरा किया जाता है।

उप संचालक कृषि (डीडीए) आशीष पांडे ने बताया कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं या उपलब्ध नहीं हैं, वहां किसानों को धान के स्थान पर कम पानी में तैयार होने वाली फसलों के प्रमाणित एवं उपचारित बीजों का उपयोग करने की सलाह दी गई है। उन्होंने कहा कि बदलते मौसम के अनुरूप फसल चयन किसानों के लिए अधिक लाभकारी साबित हो सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / हीरेन्‍द्र द्विवेदी