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बच्चों को धर्म संस्कृति रक्षा के योग्य बनाओ, उनके शारीरिक मानसिक विकास पर ध्यान दो - आचार्य श्री सागरचन्द्रसागरजी

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बच्चों को धर्म संस्कृति रक्षा के योग्य बनाओ, उनके शारीरिक मानसिक विकास पर ध्यान दो - आचार्य श्री सागरचन्द्रसागरजी


मंदसौर, 23 अगस्त (हि.स.)। आजकल माता पिता अल्पायु में अपने बच्चों पर पढ़ाई का इतना बोझ डाल देते है कि उन्हें स्कूल, ट्यूशन के अलावा कुछ दिखायी नहीं देता। स्कूली शिक्षा के साथ बच्चों को खेल मैदान पर भी भेजो, उन्हें शारीरिक मानसिक विकास का अवसर दो नही तो आगामी पीढ़ी शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर हो जायेगी। बच्चों को प्रभु महावीर की अहिंसा संदेश बताने के साथ ही बाल्यवस्था की वीरता के वृतान्त भी बताओ। बच्चों को सभी विद्याओं में पारंगत करो तभी आगामी पीढ़ी धर्म, संस्कृति रक्षा के योग्य बन सकेगी।

उक्त उद्गार परम पूज्य जैन संत आचार्य सागरचन्द्र सागर सुरिश्वरजी म.सा. ने रविवार को मध्य प्रदेश के मंदसौर में चन्द्रपुरा स्थित आर्यरक्षित सूरि जैन तीर्थ धाम में आयोजित धर्मसभा (व्याख्यान) में कहे। उन्होंने आचार्य अशोकसागरजी म.सा. सहित कई जैन आचार्यों व संतो की पावन निश्रा में रविवार को बच्चों व उनके अभिभावको (माता पिता) की उपस्थिति में आयोजित धर्मसभा में कहा कि पुरुषों की 72 व स्त्रियों की 64 कलाये होती है इन कलाओं की जानकारी व शिक्षा भी माता पिता अपनी संतान को दे। आजकल बच्चे घर, स्कूल व ट्यूशन के अलावा कहीं जाते है तो केवल मोबाइल पर। हमे हमारी युवा पीढ़ी को सुदृढ़ बनाना है तो बाल्यकाल से ही उन्हें फास्ट फूड की बजाय दूध व शक्तिवर्धक पदार्थ दो। कचौरी समोसा आपका पेट तो भर सकता है लेकिन उसमे केलोरी नहीं होती। इसलिए बच्चों को हरी सब्जियां, दाल इत्यादि खिलाये, अच्छा व संतुलित आहार ही आपके बच्चों को शारीरिक व मानसिक रूप से सुदृढ़ कर सकता है। पुराने भारतीय खेल जिनसे शरीर का व्यायाम होता है बच्चों को उन खेलो की जानकारी दे और उन्हें नियमित खेल मैदान पर भेजे। ताकि बच्चे इतने कमजोर नहीं हो पाये कि जरा सा कोई चिल्ला दे या कुछ कह दे तो उन्हें हार्ट अटैक आ जाये।

उन्होंने कहा कि आजकल की युवा पीढ़ी मुर्खता की ओर जा रही है समय पर विवाह नहीं करना और केवल करियर का बहाना बनाकर परिवार नहीं बढ़ाना मुर्खता भी हो सकती है इससे घर परिवार टूट रहे है बिखर रहे है सही समय पर विवाह व संतान होना जरूरी है ऐसा नहीं होने पर आगे जाकर परेशानी आ सकती है। जैन धर्म के अनुयायी युद्धकला, नृत्य कला, घुड़सवारी, तीरंदाजी, स्थापत्य कला में भी आगे रहे है। भगवान आदिनाथजी ने हमें जो कलाएं सिखायी है उन्हें पहचानो। जैनियों का इतिहास गौरवशाली रहा है उस इतिहास को पहचानो, हमारे घर परिवार के बच्चे भारत का भविष्य है उस भविष्य को संवारना है तो बच्चों को धर्म संस्कृति की शिक्षा दो उनसे इस विषय पर चर्चा करो। आपने कहा कि अहिंसा शूरवीरों का आभूषण है कायरता को अहिंसा नहीं कहते है दोनों में फर्क है यह बात हमारे बच्चों को बताओ।

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हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया