अमरकंटक के जंगलों में साल बोरर का प्रकोप, 60 हजार पेड़ संक्रमित; 9,535 पेड़ों की कटाई को मंजूरी
अनूपपुर, 27 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक के घने जंगलों में साल बोरर नामक कीट का प्रकोप बढ़ने से साल वृक्षों पर संकट मंडरा रहा है। वन विभाग के अनुसार, अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र में मौजूद करीब 40 लाख साल वृक्षों में से लगभग 60 हजार पेड़ संक्रमण की चपेट में हैं। संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए इनमें से 9,535 पेड़ों की कटाई को केंद्र सरकार से मंजूरी मिली है। वन विभाग ने कपिलधारा, सोनमुड़ा और अमरकंटक बीट में कटाई शुरू कर दी है। इन तीनों स्थानों पर अब तक करीब 400 पेड़ काटे जा चुके हैं।
जनवरी के अंत तक कटाई पूरी करने का लक्ष्य
बारिश के कारण रुका कटाई का काम 15 अक्टूबर से दोबारा शुरू किया गया है। वन विभाग ने जनवरी के अंत तक स्वीकृत पेड़ों की कटाई पूरी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। काटे गए पेड़ों की छिलाई करने के साथ उन्हें छोटे आकार में काटा जा रहा है। इसके बाद लकड़ियों को वन डिपो भेजा जाएगा।
अमरकंटक साल वृक्षों के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र है। ऐसे में संक्रमित लकड़ियों को आसपास जमा रखने से कीटों के दूसरे पेड़ों तक फैलने का खतरा बना रह सकता है। इसे देखते हुए वन विभाग ने अमरकंटक और आसपास के क्षेत्रों में डिपो बनाने के बजाय शहडोल जिले के नरसरा वन डिपो में लकड़ियों के भंडारण का निर्णय लिया है।
संक्रमण की स्थिति के आधार पर पेड़ों का वर्गीकरण
वन विभाग ने संक्रमण और पेड़ों की स्थिति के आधार पर उन्हें टी-1 से टी-6 श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित पेड़ों में संक्रमण की स्थिति अलग-अलग है और कई पेड़ों में यह शुरुआती चरण में है। ऐसे में समय रहते नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं।
18 अक्टूबर को जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई) की टीम ने भी क्षेत्र का दौरा किया था। संस्थान के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में संक्रमित पेड़ों को हटाने का काम कराया जा रहा है। विभाग का प्रयास है कि कीटों के प्रसार की श्रृंखला को तोड़कर जंगल के अन्य पेड़ों को बचाया जा सके।
डेढ़ साल का होता है साल बोरर का जीवनचक्र
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के सहायक प्राध्यापक डॉ. शिवाजी चौधरी के अनुसार, साल बोरर के संक्रमण पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो यह जंगल के लिए गंभीर संकट बन सकता है। एक वयस्क मादा कीट 250 से 300 अंडे देती है। इन अंडों से तीन से सात दिन में लार्वा निकल आते हैं, जो कई महीनों तक पेड़ के तने के भीतर रहकर लकड़ी को नुकसान पहुंचाते हैं।
कीट दिसंबर से अप्रैल के बीच प्यूपा अवस्था में रहते हैं। इसके बाद अगले मानसून में वयस्क बनकर बाहर निकलते हैं और संक्रमण का नया चक्र शुरू हो जाता है। साल के पेड़ से निकलने वाला गोंद यानी राल भी इन कीटों को आकर्षित करता है। कीट तने के भीतर प्रवेश कर लकड़ी को खोखला कर देते हैं, जिससे पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगता है।
1923-24 में नष्ट हुए थे करीब 70 लाख साल वृक्ष
डॉ. चौधरी के अनुसार, वर्ष 1923-24 में डिंडोरी क्षेत्र में साल बोरर के प्रकोप से करीब 70 लाख साल वृक्ष नष्ट हो गए थे। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 1995-96 में भी अमरकंटक क्षेत्र में इस कीट का बड़ा प्रकोप सामने आया था। उस समय शुरुआती स्तर पर संक्रमण को नियंत्रित नहीं कर पाने के कारण बड़ी संख्या में पेड़ प्रभावित हुए थे। बाद में संक्रमित पेड़ों को काटकर जंगल से हटाना पड़ा था।
पुराने अनुभवों को देखते हुए इस बार वन विभाग संक्रमण को सीमित रखने के लिए विशेष अभियान चला रहा है। इसके तहत संक्रमित पेड़ों को हटाने के साथ कीटों को पकड़ने और उनके प्रसार की श्रृंखला तोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
ट्रैप ट्री पद्धति से वयस्क कीटों को पकड़ने की तैयारी
वन विभाग की रणनीति वयस्क कीटों को अंडे देने से पहले पकड़कर नष्ट करने की है। इसके लिए ट्रैप ट्री पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है। संक्रमण के शुरुआती चरण में नियंत्रण के प्रयासों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि कीटों का जीवनचक्र आगे बढ़ने के साथ नए पेड़ों तक संक्रमण पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।
वन मंडलाधिकारी अनूपपुर डेविड चनाप ने मंगलवार को बताया कि अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र के 17 वन कक्षों में करीब 40 लाख साल वृक्ष हैं। इनमें लगभग 60 हजार पेड़ संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। संक्रमण की श्रृंखला तोड़ने के लिए अमरकंटक में 9,535 और डिंडोरी में 1.46 लाख पेड़ों की कटाई को केंद्र सरकार से मंजूरी मिली है।
उन्होंने बताया कि इससे पहले वन विभाग की 16 समितियों के माध्यम से 40,200 साल बोरर कीटों को पकड़कर नष्ट किया गया था। अब संक्रमित पेड़ों को काटकर हटाया जा रहा है, ताकि कीटों का प्रसार रोका जा सके और अमरकंटक के जंगलों में साल वृक्षों को बचाने के प्रयासों को गति मिल सके।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

