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ध्वनि प्रदूषण पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सख्त, मप्र सहित 17 राज्यों ने सौंपी रिपोर्ट, शेष को दो सप्ताह का पुनः नोटिस

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ध्वनि प्रदूषण पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सख्त, मप्र सहित 17 राज्यों ने सौंपी रिपोर्ट, शेष को दो सप्ताह का पुनः नोटिस


विदिशा, 27 जुलाई (हि.स.)। ध्वनि प्रदूषण और डीजे वाहनों पर लगाई जाने वाली तेज रोशनी से होने वाली दुर्घटनाओं के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने सख्त रुख अपनाया है।

विदिशा के सामाजिक कार्यकर्ता विनोद के. शाह की याचिका पर सुनवाई करते हुए आयोग ने मध्य प्रदेश सहित 17 राज्यों द्वारा प्रस्तुत की गई कार्रवाई रिपोर्ट की समीक्षा की है, जबकि शेष राज्यों को दो सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का अंतिम अवसर देते हुए नोटिस जारी किया है।

आयोग के माननीय सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 7 एवं 15 के तहत निर्धारित मानकों से अधिक ध्वनि उत्पन्न करना दंडनीय अपराध है। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति, संस्था तथा नियमों के पालन में लापरवाही बरतने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाना चाहिए।

इसी संबंध में आयोग ने सभी राज्यों से विस्तृत कार्रवाई प्रतिवेदन मांगा था।आयोग ने यह भी कहा कि डीजे वाहनों की मूल संरचना में अनधिकृत परिवर्तन कर उन पर अत्यधिक प्रकाश उपकरण एवं अन्य संशोधन करना मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 52 एवं 190 का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों को प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

अपने नोटिस में आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के उन निर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनमें ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए निर्धारित मानकों का पालन तथा रात्रि 10 बजे से प्रातः 6 बजे तक लाउडस्पीकर और आतिशबाजी के उपयोग पर प्रतिबंध लागू करने का आदेश दिए गये है। आयोग ने दोहराया कि ध्वनि प्रदूषण मुक्त वातावरण में जीवनयापन करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। राज्य सरकारों और प्रशासन का दायित्व है कि वे कानूनों का प्रभावी पालन सुनिश्चित कर नागरिकों को शांत, सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त वातावरण उपलब्ध कराएं।

हिन्दुस्थान समाचार/राकेश मीना

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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा