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मप्र - शिक्षक की कलम से नागदा में रचा गया था गांधी मानस महाकाव्य

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मप्र - शिक्षक की कलम से नागदा में रचा गया था गांधी मानस महाकाव्य


राजेंद्र प्रसाद से मिली थी प्रेरणा

नागदा, 5 सितंबर (हि.स.)। शिक्षक दिवस पर उन शिक्षकों को याद करना प्रासंगिक है, जिन्होंने अध्यापन के साथ साहित्य और समाज के क्षेत्र में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। उज्जैन जिले के नागदा में ऐसे ही एक शिक्षक हुए स्व. नटवरलाल स्नेही, जिन्होंने अपनी साहित्य साधना के दौरान इसी शहर की धरती पर महात्मा गांधी के जीवन और विचारों पर आधारित ‘गांधी मानस’ महाकाव्य की रचना की।

नटवरलाल स्नेही शासकीय शिक्षक थे, लेकिन साहित्य उनके लिए केवल अभिरुचि नहीं, बल्कि साधना था। उनकी करीब 25 काव्य कृतियां प्रकाशित हुईं। देश के प्रमुख समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनकी लगभग एक हजार कविताएं, कहानियां और निबंध प्रकाशित हुए। उन्होंने दो महाकाव्य और दो खंडकाव्य भी लिखे। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘जीवन’, ‘वेदना’, ‘कलकल’, ‘मंत्रणा’, ‘अंतर्ज्वाला’, ‘प्रवासी पार्थ’, ‘नवरत्न’, ‘अमृत बिंदु’, ‘जयपथ’, ‘पुष्पांजलि’ और ‘स्नेहार्चन’ आदि शामिल हैं। हालांकि अब उनका निधन हो चुका है। इस संवाददाता को उनके जीवंत अवस्था में कई बार संवाद करने का अवसर मिला था। आज शिक्षक दिवस उनसे कुछ समय पहले हुई चर्चा ताजा हो रही है।

उन्होंने बताया था कि महात्मा गांधी के निधन के बाद उनके जीवन और व्यक्तित्व को काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करने की प्रेरणा मिली। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रोत्साहन और आर्थिक सहयोग के आश्वासन से उन्हें इस महाकाव्य की रचना के लिए संबल मिला। बाद में देश के प्रसिद्ध उद्योगपति, चिंतक एवं लेखक स्व. घनश्याम दास बिड़ला के तत्कालीन सलाहकार डी.पी. मंडेलिया का भी सहयोग मिला। वर्ष 1951 में गांधी मानस के प्रकाशन का सपना साकार हुआ।

गांधी मानस को राजस्थान तथा दक्षिण भारत के कुछ राज्यों के शिक्षा पाठ्यक्रमों के वाचनालयों के लिए स्वीकृत है। मध्यभारत कला परिषद तथा मध्यभारत के तत्कालीन कई मुख्यमंत्रियों ने भी स्नेहीजी की साहित्य साधना को पुरस्कृत किया था। राष्ट्रकवि स्व. मैथिलीशरण गुप्त और स्व. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ सहित अनेक साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने उनकी रचनाओं की प्रशंसा की थी। स्नेहीजी की कविता ‘बढ़े चलो’ को मध्यप्रदेश शासन ने कक्षा पांचवीं के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया था।

स्नेहीजी का जीवन साहित्य तक सीमित नहीं था। वे स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े रहे। दीनदयाल उपाध्याय चौक के समीप स्थित उनके निवास ‘पर्णकुटी’ में आजादी के आंदोलन से जुड़े कई क्रांतिकारियों को आश्रय मिला। स्थानीय विवरणों में क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के भी उनके निवास पर ठहरने का उल्लेख मिलता है। उनकी काव्य कृति ‘प्लूत’ का लोकार्पण प्रसिद्ध कवि एवं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के पूर्व कुलपति स्व. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने किया था।

स्नेहीजी की साहित्यिक सक्रियता नागदा तक सीमित नहीं रही और उनकी रचनाएं देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। वर्ष 1995 में नटवरलाल स्नेही का निधन हुआ। शिक्षक दिवस पर उनकी साहित्य साधना को स्मरण करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने शिक्षक की भूमिका निभाते हुए साहित्य को जीवन का मिशन बनाया और नागदा की धरती पर गांधी के जीवन-दर्शन को महाकाव्य के रूप में शब्द दिए।

हिन्दुस्थान समाचार / कैलाश सनोलिया