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‘ऑन टाइम, एवरी टाइम’ से बनी मुंबई डब्बावालों की ग्लोबल पहचान : सुनील गवांडे

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‘ऑन टाइम, एवरी टाइम’ से बनी मुंबई डब्बावालों की ग्लोबल पहचान : सुनील गवांडे


भोपाल, 30 सितंबर (हि.स.)। समय की पाबंदी, अनुशासन, मेहनत और ईमानदारी ने मुंबई के डब्बावालों को दुनिया में अलग पहचान दिलाई है। करीब 136 साल से मुंबई में डब्बावाले लोगों तक घर का खाना पहुंचाने और खाली टिफिन वापस लौटाने का काम पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। आज करीब 5 हजार डब्बावाले प्रतिदिन दो लाख ग्राहकों तक टिफिन पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ‘ऑन टाइम, एवरी टाइम’ के सिद्धांत पर काम करने वाली इस व्यवस्था को प्रबंधन की दुनिया में भी एक सफल मॉडल के रूप में देखा जाता है।

मुंबई डब्बावाला एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और सीईओ सुनील गवांडे ने यह जानकारी दी। वे बुधवार को एमसीयू के प्रबंधन विभाग की ओर से आयोजित विशेष व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उनके लिए कर्म ही पूजा है और प्रत्येक ग्राहक ईश्वर के समान है। परिस्थितियां कैसी भी हों, डब्बावाले पूरी निष्ठा के साथ अपना काम करते हैं। ग्राहकों के चेहरों पर दिखने वाली संतुष्टि और मुस्कान ही उनके लिए सबसे बड़ा प्रमाणपत्र है।

1890 में 35 डब्बेवालों से शुरू हुई थी सेवा

सुनील गवांडे ने डब्बावाला सेवा की शुरुआत की कहानी बताते हुए कहा कि करीब 136 वर्ष पहले मुंबई में एक पारसी बैंकर ने एक व्यक्ति को अपने घर से कार्यालय तक भोजन पहुंचाने और खाली टिफिन वापस लाने का काम सौंपा था। इसके बदले उसे हर महीने निश्चित राशि दी जाती थी। इसी व्यवस्था से प्रेरणा लेकर मधु हवाजी बाच्चे ने वर्ष 1890 में 35 डब्बेवालों के साथ डब्बावाला सेवा की शुरुआत की।

आज यही व्यवस्था मुंबई में 60 से 70 किलोमीटर के दायरे तक फैल चुकी है। करीब 5 हजार डब्बावाले प्रतिदिन दो लाख ग्राहकों तक टिफिन पहुंचाने का काम करते हैं। इस पूरी व्यवस्था में समय का विशेष ध्यान रखा जाता है।

कम पढ़ाई, लेकिन बेहतर व्यवसाय प्रबंधन

गवांडे ने कहा कि जीवन में शिक्षा का महत्व बहुत अधिक है। जिस तरह कोई पक्षी पंखों के बिना उड़ नहीं सकता, उसी तरह शिक्षा के बिना इंसान भी बहुत कुछ हासिल नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि अधिकांश डब्बावाले कम पढ़े-लिखे या लगभग अनपढ़ हैं, लेकिन वे व्यवसाय और प्रबंधन की बारीकियों को अच्छी तरह समझते हैं। यही वजह है कि डब्बावाला व्यवसाय में अब चौथी पीढ़ी भी काम कर रही है। संगठन में काम करने का तरीका ऐसा है कि हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझता है और पूरी व्यवस्था आपसी तालमेल के साथ चलती है।

साइकिल से पहुंचता है टिफिन, कार्बन फुटप्रिंट भी शून्य

डब्बावालों की व्यवस्था की एक खासियत यह भी है कि प्रत्येक डब्बावाला साइकिल का इस्तेमाल करता है। इसके चलते इस सेवा का कार्बन फुटप्रिंट भी शून्य है। एक टीम में सामान्यत: 20 से 30 डब्बावाले होते हैं। यही टीम ग्राहक के घर से टिफिन लेने, उसे निर्धारित स्थान तक पहुंचाने और भोजन के बाद खाली टिफिन वापस ग्राहक के घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी संभालती है।

गवांडे ने बताया कि संगठन में आज तक कभी हड़ताल नहीं हुई। सभी सदस्य अपने काम और जिम्मेदारी को प्राथमिकता देते हैं। कम संसाधनों के बावजूद समय पर सेवा उपलब्ध कराना ही डब्बावालों की कार्यशैली की पहचान बन चुकी है।

प्रिंस चार्ल्स की मुलाकात के बाद दुनिया तक पहुंची कहानी

सुनील गवांडे ने बताया कि वर्ष 2003 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रिंस चार्ल्स भारत आए थे और उन्होंने मुंबई के डब्बावालों से मुलाकात की थी। इसके बाद डब्बावालों की कार्यप्रणाली और उनकी सेवा की कहानी वैश्विक स्तर पर चर्चा में आई।

डब्बावालों के लिए कल्याणकारी कार्यों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से वर्ष 2017 में डब्बावाला एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई गई। कंपनी की खास बात यह है कि इसमें चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर से लेकर मैनेजिंग डायरेक्टर तक डब्बावाले ही हैं। प्रत्येक डब्बावाला कंपनी में शेयर होल्डर है।

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक आपदाओं के समय भी डब्बावाला संगठन आगे बढ़कर देश के लोगों की मदद करता है। भविष्य की योजनाओं में एक ग्लोबल फूड कंपनी शुरू करने की योजना भी शामिल है।

समय प्रबंधन और टीमवर्क का बेहतरीन उदाहरण

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि करीब दो लाख टिफिन को मामूली गलती के बिना सही व्यक्ति तक समय पर पहुंचाना डब्बावालों की कार्यप्रणाली की बड़ी विशेषता है। भारतीयों द्वारा संचालित किसी उपक्रम में समयबद्धता और अनुशासन का यह बेहतरीन उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि डब्बावालों का काम प्रबंधन के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण पाठ है। इसमें टीमवर्क और समय प्रबंधन की बड़ी भूमिका है। विद्यार्थियों को डब्बावालों की कार्यप्रणाली को समझना चाहिए। उन्होंने इसे मुंबई की एक महत्वपूर्ण सफलता कहानी बताया।

मेहनत और ईमानदारी ही ब्रांड

डब्बावाला एंटरप्राइजेज से आए अन्य वक्ता रंजीत ने डब्बावालों की सफलता के पीछे के प्रबंधन सूत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डब्बावाले अपनी सेवा का शुल्क बहुत कम रखते हैं। कंपनी का कोई बड़ा या भारी-भरकम कॉर्पोरेट कार्यालय भी नहीं है। उनकी असली ब्रांडिंग कड़ी मेहनत, ईमानदारी और त्रुटिरहित सेवा है। उन्होंने कहा कि डब्बावालों की सप्लाई चेन व्यवस्था का कोई मुकाबला नहीं है। यही कारण है कि मुंबई के डब्बावालों की कार्यप्रणाली पर सिक्स सिग्मा स्टडीज हुई हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल सहित दुनिया के कई प्रमुख प्रबंधन संस्थानों में डब्बावालों के काम को केस स्टडी के तौर पर पढ़ाया गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा