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मप्र के हर संभाग में बने ‘फिट फैसिलिटी सेंटर’, बालिकाओं को भोपाल भेजने की मजबूरी खत्म हो- बाल आयोग का पत्र जारी

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मप्र के हर संभाग में बने ‘फिट फैसिलिटी सेंटर’, बालिकाओं को भोपाल भेजने की मजबूरी खत्म हो- बाल आयोग का पत्र जारी


मप्र के हर संभाग में बने ‘फिट फैसिलिटी सेंटर’, बालिकाओं को भोपाल भेजने की मजबूरी खत्म हो- बाल आयोग का पत्र जारी


- प्रदेश के सिर्फ 12 जिलों में बालिकागृह, ग्वालियर-चंबल संभाग में एक भी शासकीय बालिकागृह नहीं

- बाल अधिकार आयोग ने महिला एवं बाल विकास विभाग को भेजा पत्र

भोपाल, 03 अक्टूबर (हि.स.)। संरक्षण और आश्रय की जरूरत वाली बालिकाओं को सुरक्षित ठिकाने के लिए अब उन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर राज्य की राजधानी भोपाल लाने की व्यवस्था पर मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। अब इस संबंध में आयोग ने नई व्यवस्था की पहल की है।

दरअसल, आयोग ने प्रदेश के हर संभाग में उपयुक्त संस्थाओं को ‘फिट फैसिलिटी’ घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग से कार्रवाई करने को कहा है। मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग का मानना है कि किसी बालिका को उसके निकटतम संभाग में ही सुरक्षित आश्रय और संरक्षण उपलब्ध कराया जाना उसके सर्वोत्तम हित में है। वर्तमान में प्रदेश के केवल 12 जिलों में बालिकागृह संचालित हैं, जबकि ग्वालियर और चंबल संभाग में एक भी शासकीय बालिकागृह नहीं है। ऐसे में इन संभागों की विशेष परिस्थितियों वाली बालिकाओं को भोपाल स्थित बालिकागृह में भेजा जाता है।

मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा ने महिला एवं बाल विकास विभाग की सचिव को पत्र भेजकर प्रदेश के प्रत्येक संभाग में उपलब्ध उपयुक्त संस्थाओं का परीक्षण कर उन्हें किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 39(3) के तहत ‘फिट फैसिलिटी’ घोषित किए जाने की कार्रवाई करने की अपेक्षा की है। आयोग ने इस संबंध में विभागीय स्तर से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने और ऐसी सुविधाओं के चयन, मान्यता, संचालन, निरीक्षण तथा गुणवत्ता मानकों के लिए स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) निर्धारित करने पर भी जोर दिया है।

12 जिलों में ही बालिकागृह

आयोग ने अपने पत्र में महिला एवं बाल विकास विभाग के 16 अप्रैल 2026 के आदेश के साथ प्रकाशित तालिका-2 का हवाला देते हुए कहा है कि वर्तमान में प्रदेश के मात्र 12 जिलों में बालिकागृह संचालित हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ग्वालियर एवं चंबल संभाग में कोई शासकीय बालिकागृह संचालित नहीं है। परिणामस्वरूप इन संभागों की ऐसी बालिकाओं को, जिन्हें आश्रय एवं संरक्षण की आवश्यकता होती है, भोपाल स्थित बालिकागृह में प्रवेश दिलाया जाता है।

यह स्थिति विशेष रूप से उन बालिकाओं के लिए चुनौतीपूर्ण है, जो पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत पीड़ित, लैंगिक अपराध से प्रभावित अथवा गर्भवती होती हैं। आयोग ने कहा है कि ऐसी बालिकाओं को अपने क्षेत्र से बहुत दूर ले जाने पर उन्हें मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है। साथ ही न्यायिक कार्यवाही, चिकित्सकीय परीक्षण, परामर्श सेवाओं और परिवार से संपर्क बनाए रखने में भी अनावश्यक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं।

‘बाल हित सर्वोपरि’ पर आयोग का जोर

आयोग ने पत्र में स्पष्ट किया है कि ऐसी व्यवस्था ‘बाल हित के सर्वोत्तम सिद्धांत’ (बेस्ट इंटरेस्ट ऑफ द चाइल्ड) के अनुरूप नहीं है। संरक्षण की जरूरत वाली बालिका के लिए केवल सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके मानसिक और भावनात्मक हितों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अपने निकटतम संभाग में सुरक्षित आश्रय मिलने से बालिका को परिचित सामाजिक वातावरण से पूरी तरह अलग होने की स्थिति से बचाया जा सकता है।

आयोग का मानना है कि यदि प्रत्येक संभाग में उपयुक्त संस्था को ‘फिट फैसिलिटी’ के रूप में मान्यता मिलती है तो बालिकाओं को उनके निकटतम संभाग में ही सुरक्षित आश्रय एवं संरक्षण उपलब्ध कराया जा सकेगा। इससे भोपाल स्थित संस्थान पर निर्भरता भी कम होगी और आवश्यक सेवाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था मजबूत हो सकेगी।

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 39(3) का उपयोग

आयोग ने अपने पत्र में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 39(3) को आधार बनाया है। इस प्रावधान के अनुसार आवश्यकता होने पर किसी उपयुक्त संस्था को ‘फिट फैसिलिटी’ के रूप में मान्यता प्रदान की जा सकती है। आयोग ने इसी प्रावधान का प्रभावी उपयोग करते हुए प्रदेश के प्रत्येक संभाग में उपलब्ध उपयुक्त संस्थाओं का चयन कर उन्हें ‘फिट फैसिलिटी’ के रूप में अधिसूचित करने की जरूरत बताई है।

इसके लिए आयोग ने विभाग से कहा है कि संभागीय स्तर पर समस्त संभागीय संयुक्त संचालकों, जिला कार्यक्रम अधिकारियों एवं अन्य सक्षम अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। इससे प्रत्येक संभाग में ऐसी संस्थाओं की पहचान, परीक्षण और मान्यता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकेगा।

चयन से लेकर निरीक्षण तक तय हो एसओपी

आयोग ने केवल संस्थाओं को चिन्हित करने की बात नहीं कही है, बल्कि ‘फिट फैसिलिटी’ के चयन, मान्यता, संचालन, निरीक्षण और गुणवत्ता मानकों के संबंध में स्पष्ट एसओपी निर्धारित करने का भी सुझाव दिया है। आयोग का कहना है कि इससे प्रदेशभर में ऐसी सुविधाओं के संचालन में एकरूपता सुनिश्चित की जा सकेगी और बालिकाओं को उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता पर भी निगरानी रखी जा सकेगी।

आयोग ने उम्मीद जताई है कि यह व्यवस्था बालिकाओं के हितों की रक्षा, त्वरित पुनर्वास तथा बाल-अनुकूल संरक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। पत्र के अंत में आयोग ने विभाग से पूरे विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए आवश्यक कार्रवाई की अपेक्षा की है।

फैक्ट फाइल

प्रदेश में बालिकागृह : वर्तमान में 12 जिलों में

ग्वालियर संभाग : शासकीय बालिकागृह नहीं

चंबल संभाग : शासकीय बालिकागृह नहीं

वर्तमान व्यवस्था : जरूरतमंद बालिकाओं को भोपाल स्थित बालिकागृह भेजा जाता है

आयोग की मांग : हर संभाग में उपयुक्त संस्था को ‘फिट फैसिलिटी’ घोषित किया जाए

कानूनी आधार : किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 39(3)

अतिरिक्त मांग : चयन, मान्यता, संचालन, निरीक्षण और गुणवत्ता के लिए स्पष्ट एसओपी निर्धारित हो

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी