सदानीरा समागमः समकालीन व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य बनी नाट्य प्रस्तुति लघुशंका नगर
भोपाल, 29 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग अंतर्गत वीर भारत न्यास द्वारा भारत भवन में आयोजित सदानीरा समागम के तीसरे दिन शुक्रवार की शाम रंगमंच की एक अनूठी और प्रयोगशील प्रस्तुति ‘लघुशंका नगर’ ने दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।
सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के ललित कला केंद्र गुरुकुल द्वारा प्रस्तुत इस नाटक ने मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करते हुए दर्शकों को गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम के पूर्व रंग में जानकी बैंड ने नदी विषयक गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं। लोकधुनों और संवेदनशील गीतों से सजे इस संगीतात्मक वातावरण ने समागम के सांस्कृतिक स्वरूप को और अधिक जीवंत बना दिया।
बहिरंग में मंचित ‘लघुशंका नगर’ मूल रूप से अमेरिकी नाटककार ग्रेग कोटिस के प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक संगीतप्रधान नाटक ‘यूरिनटाउन’ पर आधारित है। हालांकि. इसकी पृष्ठभूमि विदेशी और कथा काल्पनिक प्रतीत होती है, लेकिन इसके प्रश्न समकालीन समाज, व्यवस्था, संसाधनों पर नियंत्रण और आम मनुष्य के संघर्षों से गहराई से जुड़े हुए हैं। यही कारण रहा कि नाटक ने दर्शकों के भीतर वर्तमान सामाजिक यथार्थ को लेकर कई प्रश्न खड़े किए।
प्रस्तुति के माध्यम से विद्यार्थियों ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, मनुष्य और समय के प्रश्नों से संवाद स्थापित करने की एक सशक्त कलात्मक प्रक्रिया है। ललित कला केंद्र गुरुकुल ने इस नाट्य-यात्रा के जरिए विद्यार्थियों को प्रयोगशील रंगकर्म, सामूहिक सृजन और आत्मचिंतन की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया।
नाटक की तैयारी के दौरान विद्यार्थियों ने अमेरिकी म्यूजिकल थिएटर की परंपराओं का अध्ययन किया और लैटिन अमेरिकी लोककलाओं की प्रस्तुति शैली से प्रेरणा ग्रहण की। इसी कारण मंचन में संगीत, नृत्य, रंग और उत्सवधर्मिता का प्रभावशाली समन्वय देखने को मिला। रंग-बिरंगे परिधान, जीवंत संगीत, प्रभावपूर्ण नृत्य और ऊर्जावान मंच संचालन ने प्रस्तुति को आकर्षक बनाया, वहीं पात्रों की भावनात्मक गहराई ने इसे संवेदनात्मक स्तर पर भी प्रभावी बनाया।
प्रस्तुति की विशेषता यह रही कि कलाकारों ने स्वाभाविक अभिनय शैली और शारीरिक अभिव्यक्ति के विविध रूपों का प्रभावी उपयोग किया। मंच पर अभिनेता केवल संवादों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि अपनी देहभाषा और सामूहिक गतियों के जरिए भी कथा को अभिव्यक्त करते नजर आए। इस प्रक्रिया में विद्यार्थियों ने प्रसिद्ध रंगचिंतक अंतोनिन आर्तो की अभिनेता की देहभाषा संबंधी अवधारणाओं को समझते हुए उन्हें मंच पर साकार करने का प्रयास किया।
नाटक में अभिनय करने वाले कलाकारों में अथर्व परांजपे, अथर्व ओगले, अदिति देशमुख, आर्या गंजेडांकर, ओंकार सुपेकर, करण हातावळे, गायत्री नाईक, दिव्या कुलकर्णी, तन्वी ठाकुर, प्रीति मांजरे, प्रभाकर सावंत, पृथ्वी सराडे, पूजा लेटके, मानसी कदम, यश चिखले, शर्वरी पांडे, श्रद्धा निम्बळ, श्वेता नाईकडे, सत्यजित जय और सुयोग बागावत शामिल रहे। सभी कलाकारों ने अपनी सशक्त अभिनय क्षमता और सामूहिक प्रस्तुति से दर्शकों की सराहना प्राप्त की।
नृत्य संयोजन सई शेट्ये ने किया, जिसने प्रस्तुति को विशेष गतिशीलता प्रदान की। तकनीकी पक्ष भी अत्यंत सशक्त रहा। वेशभूषा की जिम्मेदारी कोमल शेलके ने निभाई, जबकि रंगभूषा सुरेश कुमार द्वारा की गई। नेपथ्य निर्माण में विशाल बांगकर, शुभम साठे और चिनाब का योगदान रहा। प्रकाश योजना दीपक सोनवणे ने तैयार की, वहीं समृद्धि सोंडे ने प्रकाश सहयोग दिया। पोस्टर डिजाइन चिनाब द्वारा तैयार किया गया तथा प्रचार-प्रसार का दायित्व आदिति देशमुख और करण सूर्य ने संभाला।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

