महाभारत समागम के चौथे दिन हुई कर्णवध और कनुप्रिया की प्रस्तुति
- विश्व कवियों की युद्ध-विरोधी कविताओं का हुआ प्रभावशाली पुनर्पाठ
भोपाल, 19 जनवरी (हि.स.)। देश में पहली बार मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में चल रहे सभ्यताओं के संघर्ष एवं औदार्य की महागाथा पर केंद्रित नौ दिवसीय महाभारत समागम के चौथे दिन सोमवार की रात कर्णवद और कनुप्रिया की प्रस्तुति हुई, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।
वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित इस समागम के चौथे दिन दुनिया के प्रसिद्ध कवियों- विस्साव शिम्बोर्स्का, पाब्लो नेरूदा, वाल्ट ह्विटमैन, बर्तोल्त ब्रेख्त, बोरिस पॉस्तरनाक, अबाई कुनान्बायेव, नाजिम हिकमत, निजार कब्बानी की चुनी हुई युद्ध विरोधी रचनाओं के पुनर्पाठ का केंद्र रहा। इस अवसर पर वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी, डॉ. संतोष चौबे, राजेन्द्र गुप्त, जयंत देशमुख, प्रेमशंकर शुक्ल आदि ने विश्व के चर्चित कवियों की चयनित कविताओं का पाठ किया।
इसी के साथ वैश्विक सभ्याताओं के संघर्ष एवं औदार्य अंतर्गत भारत होने का अर्थ विषय पर डॉ. वसंत शिंदे, डॉ. सीताराम दुबे, डॉ. शिवाकांत वाजपेयी, डॉ. राजेश शर्मा, दीपाली पटवाडकर, डॉ. विजय मनोहर तिवारी, डॉ. मुकेश मिश्रा, शैलेन्द्र शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किये। इस सत्र का वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश पांडेय एवं आनंद पांडे जी ने संचालन किया।
काव्य पाठ अंतर्गत इस अवसर पर प्रेमशंकर शुक्ल द्वारा दुनिया के प्रसिद्ध कवि विस्साव शिम्बोर्स्का की कविता अंत और आरंभ का पाठ किया- हर युद्ध के बाद... किसी न किसी को सब कुछ ठीक करना पड़ता है.... आखिर चीजें अपने आप तो ठिकाने नहीं लग जाएँगी... किसी को सड़कों से मलबा हटाना पड़ता है... ताकि लाशों से भरी गाडियाँ गुजर सकें....
जयंत देशमुख ने बोरिस पास्तरनाक की कविता विजेता का पाठ करते हुए कहा -क्या तुम्हें याद है... वह गले की खराश, शैतानों का मुक़ाबला करते हुए... जो तड़पा रही थी बार-बार, वे ताली बजाते शोर मचाते जा रहे थे... और कुछ ही दूरियों पर था वसंत... लेकिन सच्चाई एक ऐसी ढाल थी जिसे कोई हथियारबंद भेद नहीं सकता था....
इसके पहले कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने कहा कि 21वीं सदी अपने सबसे कठिन समय में है, जब दुनिया के आधे से अधिक देश अपनी इस फलती-फूलती मुस्कुराती दुनिया को ही मिटा देने पर बुरी तरह से आमादा हैं तब आप सब साथी इस खूबसूरत, विकास की अनंत संभावनाओं और कविता से भरी पूरी दुनिया को बचाने के लिए अपनी-अपनी अंजुरीभर, बित्ता सी कोशिश के लिए आ जुटे हैं। इससे हमारी, और जाहिर है कि सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामय: की संस्कृति और सभ्यता वाले भारतवर्ष की हिम्मत निश्चित रूप से बंध रही होगी, ऐसा मेरा अधिक विश्वास है। हम भारतवर्ष की विरासत के... सर्जनात्मकता के... तथा भगवान श्रीकृष्ण के शांति, अनुशासन, अभय तथा उदय के पाठ को गुनने, समझने तथा ह्दय में आत्मसात् करने का आह्वान कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हम सिंधु सभ्यता के मौन, मेसोपोटामिया के भय आधारित कानून, मिस्र के मृत्यु बोध, चीन की नैतिक सत्ता, यूनान के प्रश्नाकुल विवेक, रोम की संस्थागत शक्ति, माया-इंका के चक्रीय समय और फारस की सहिष्णु दृष्टि को आत्मसात कर वर्तमान एवं भविष्य की सभ्यता के संतुलन को साधना चाहते हैं। क्योंकि भारत या भारतीय होने का अर्थ ही है युद्धों से भरा विश्व इतिहास हमारे लिए इतिहास का निर्णय नहीं, मानवीय करुणा एवं सर्जनात्मकता का संवाद है। हम सारी भूली बिसरी सभ्यताओं की आवाज सुनना और दोहराना चाहते हैं, क्योंकि यही भारतवर्ष की आवाज है।
मयूरभंज शैली में कर्णवध की प्रस्तुति
इसके पहले पूर्वरंग सत्र में ‘कर्णवध’ नृत्य-नाटिका का प्रभावशाली मंचन हुआ। मयूरभंज नृत्य शैली में प्रस्तुत इस नृत्यनाटिका का निर्देशन आदित्यप्रताप दास ने किया। महाभारत के युद्धकालीन प्रसंग पर आधारित यह प्रस्तुति वीरता, नियति और करुणा की त्रिवेणी को सशक्त रूप में उकेरती है। नाटक की शुरुआत कर्ण के वीरतापूर्ण प्रवेश से होती है, जहाँ मयूरभंज शैली के जटिल चरण और मुद्राएँ उसके साहस और गर्व को अभिव्यक्त करती हैं। आगे दुर्योधन और अर्जुन के मध्य युद्ध की घोषणा का दृश्य आता है, जिसमें अहंकार, सत्ता और धर्म का द्वंद्व नृत्य के माध्यम से सजीव हो उठता है। ढोलक और मृदंग की ताल पर प्रस्तुत युद्ध संवाद दर्शकों को रोमांचित करते हैं। कर्ण और अर्जुन के भीषण संघर्ष में दोनों योद्धाओं की शक्ति, चातुर्य और अंतर्द्वंद्व भावपूर्ण गतियों में उभरते हैं। कर्णवध का दृश्य करुणा और वीरगाथा का चरम बिंदु बनता है। अंत में कर्ण के बलिदान और महानता को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
कनुप्रिया ने राधा के अंतर्मन को किया सजीव
अंतरंग सभागार में कोरस रेपेट्री थियेटर, इम्फाल (मणिपुर) द्वारा प्रस्तुत नाट्य प्रस्तुति कनुप्रिया दर्शकों के लिए एक गहन भावात्मक अनुभव बनी। धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध काव्य संग्रह कनुप्रिया पर आधारित इस नाटक का निर्देशन रतन थियाम एवं थवाई थियाम ने किया। यह प्रस्तुति राधा–कृष्ण के प्रेम को राधा के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है, जहाँ प्रेम मिलन से अधिक वियोग, प्रतीक्षा और आत्मबोध की यात्रा बन जाता है। राधा के भीतर उठते प्रश्न, उसकी पीड़ा और उसका अटूट प्रेम नाटक का केंद्र हैं। रतन थियाम की विशिष्ट रंग-दृष्टि में लाल रंग, प्रकाश-अंधकार, मौन और संगीत का सशक्त प्रयोग मंच को काव्यात्मक बना देता है। मणिपुरी लोक कलाओं और पारंपरिक सौंदर्यबोध से सजी यह प्रस्तुति नारी संवेदना, प्रेम और आध्यात्मिक खोज को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करती है।
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

