भोपाल में कम जानी-पहचानी प्रजातियों पर चौथी नेशनल कॉन्फ्रेंस संपन्न
- नदी संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका पर हुई चर्चा
भोपाल, 18 जनवरी (हि.स.)। इफको भोपाल में लेसर नोन स्पीशीज पर आधारित दो दिवसीय चौथी नेशनल कॉन्फ्रेंस का रविवार को समापन हुआ। इस राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन नदी संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका पर गहन चर्चा हुई।
सम्मेलन के दूसरे रविवार को पहले सत्र में नदियों के स्वास्थ्य और संरक्षण पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया किनदियां केवल जल का माध्यम नहीं हैं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं। विपिन व्यास, प्रोफेसर, बायोसाइंस, एचओडी, जूलॉजी और एप्लाइड एक्वाकल्चर, बरकतुल्लाह विश्विद्यालय ने बताया किनदी घाटी का दर्पण है और पारिस्थितिकी तंत्र को समझे बिना नदी संरक्षण संभव नहीं है। उन्होंने यह भी बताया किनर्मदा में मछलियों की 93 प्रजातियां पाई जाती हैं।
तरुण नायर, लीड - प्रोग्राम मकर, वाइल्ड लाइफ़ कंज़र्वेशन ट्रस्ट, मुंबई ने चंबल नदी में खनन के कारण हो रहे नुकसान और घड़ियालों पर इसके प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण गलत समय में तेज बारिश होने से घड़ियाल के अंडे डूब सकते हैं। बांधों से नदी प्रवाह में आने वाली बाधाओं और इससे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी चिंता व्यक्त की गई।
शारदा कोसानकर, प्रधान वैज्ञानिक एवं एसोसिएट प्रोफेसर (एसीएसआईआर) सीएसआईआर - नीरी ने चिंताजनक तथ्य साझा करते हुए बताया कि देश की 70 प्रतिशत नदियों का स्वास्थ्य मरणासन्न स्थिति में है। छत्तीसगढ़ में कोयला खदानों के पास की नदियों पर किए गए उनके अध्ययन से पता चला कि निरंतर कोयला खनन का कचरा नदियों में जमा हो रहा है, जिससे प्रवाह प्रभावित हो रहा है।
महाशीर संरक्षण की चुनौतियां
सेज यूनिवर्सिटी, भोपाल की एचओडी एक्वाकल्चर श्रीपर्णा सक्सेना ने महाशीर मछली के संरक्षण पर महत्वपूर्ण प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि दुनिया में महाशीर की 47 प्रजातियां हैं, जिनमें से 15 भारत में पाई जाती हैं। नर्मदा में टोर टोर डीप बॉडीड प्रजाति पाई जाती है।
चिंताजनक बात यह है कि खुले पानी में अब केवल 2 प्रतिशत से कम महाशीर बची है। उन्होंने बताया कि महाशीर का अस्तित्व सीधे तौर पर वन क्षेत्र से जुड़ा है - अच्छा जंगल, अच्छा पानी और अच्छा पानी का मतलब महाशीर की उपस्थिति। माही और टोंस बेसिन में आज एक भी महाशीर नहीं बची है।
पारिस्थितिक प्रवाह का महत्व
तरुण नायर ने नदी के पारिस्थितिक प्रवाह पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्रवाह की मात्रा के साथ-साथ प्रवाह का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सोन नदी पर बने बांधों के प्रभाव का अध्ययन प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि बांध प्रबंधन द्वारा 50 क्यूमेक्स प्रवाह बनाए रखने का दावा किया जाता है, लेकिन वास्तविकता में यह 5 क्यूमेक्स से भी कम पाया गया।
लुप्तप्राय प्रजातियों पर ध्यान
आईयूसीएन के भारत के प्रतिनिधि यशवीर भटनागर ने बताया कि भारत में 48,600 प्रजातियां लुप्ती की कगार पर हैं, लेकिन केवल 2 प्रतिशत प्रजातियों के बारे में ही पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। स्थानिक प्रजातियों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
गौतम कदम, PhD रिसर्चस्कॉलर, सेक्रेड हार्टकॉलेज कोच्चि, MGU, कोट्टायम ने टैरेंटुला मकड़ियों और उनके अवैध व्यापार पर प्रकाश डाला। भारत की 125 ओल्ड वर्ल्डप्रजातियों में 98 प्रतिशत स्थानिक हैं। मध्य भारत में 1336 मकड़ी प्रजातियां पाई जाती हैं जो देश की कुल मकड़ी विविधता का 14 प्रतिशत हैं।
समुदाय की भूमिका
सम्मेलन में स्थानीय समुदायों के संरक्षण प्रयासों को विशेष महत्व दिया गया। काशिफ फारूक भट चौथी पीढ़ी के वन्यजीव संरक्षणवादी के रूप में जम्मू-कश्मीर में हंगुल को बचाने का काम कर रहे हैं। राजस्थान से पंकज बिश्नोई और खेतुला बिश्नोई गोडावण संरक्षण में सक्रिय हैं। दार्जिलिंग से उत्सव प्रधान परमाकल्चर के माध्यम से पूर्वी हिमालय के पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे रहे हैं।
मीडिया की भूमिका
पर्यावरण पत्रकारिता पर हुए सत्र में राउंडग्लास सस्टेन की मेघा मूर्ति, मोंगाबे के शैलेश श्रीवास्तव और ग्राउंड रिपोर्टडॉट इन के श्री पल्लव जैन ने भारतीय वन्यजीव और प्रजातियों को भारतीय नजरिए से प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर बल दिया। विशेषज्ञों ने मुख्यधारा मीडिया में पर्यावरण संबंधी मुद्दों की गहन रिपोर्टिंग की कमी पर चिंता जताई।
सेमीनार की उपलब्धि पर बात करते हुए भारतीय वन प्रबंधन संस्थान में पूर्व अध्यापक बी.सी. चौधरी ने कहा कि जैसे देश के विकास के लिए गुजरात मॉडल अपनाया गया, वैसे ही देश में वन्यजीव संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश रोल मॉडल है। सम्मेलन के समापन के रूप में रविवार को देश के प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी असद रहमानी के नेतृत्व में वन विहार में पक्षी भ्रमण का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन लेसर नोन स्पीशीज के संरक्षण और जैव विविधता को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। यह आयोजन ‘सोसाइटी ऑफ़ नेचर हीलर्स, कंज़रवेटर एंड लोकल टूरिज्म डेवेलपमेंट’ (SNHC) और मध्य प्रदेश बायोडाईवर्सिटी बोर्ड के तत्वाधान में संपन्न हुआ।
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

