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इंदौरः 'राग अमीर' संगीत समारोह में अंतिम दिन सजी श्रेष्‍ठ साधकों की संगीत सभाएं

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इंदौरः 'राग अमीर' संगीत समारोह में अंतिम दिन सजी श्रेष्‍ठ साधकों की संगीत सभाएं




इंदौर, 05 फरवरी (हि.स.)। मध्‍य प्रदेश शासन, संस्‍कृति विभाग द्वारा इन्‍दौर के जाल सभागृह में पद्मभूषण उस्‍ताद अमीर खां की स्‍मृति में आयोजित दो दिवसीय ‘‘राग अमीर’’ संगीत समारोह का गुरुवार देर शाम समापन हुआ।

उस्‍ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित इस संगीत समागम के दूसरे दिवस गुरुवार को चार संगीत सभाएं सजीं। गायिकी में संगीत घरानों की परम्‍पराएं तो तबले की थाप पर सुदीर्घ साधना की ज्‍योति दमक उठी। कलाकारों का स्वागत उस्ताद अमीर खां के पुत्र एवं सुप्रसिद्ध अभिनेता शाहबाज खान, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक प्रकाश सिंह ठाकुर एवं उप निदेशक शेखर करहाड़कर ने पुष्पगुच्छ भेंट कर किया।

दूसरे दिवस की पहली सभा गायन के नाम रही, मंच पर सुरीले स्‍वरों के साथ विदुषी गीतिका उमड़ेकर पुणे उपस्थित थीं। ग्‍वालियर घराने के मूर्धन्‍य संगीत साधक एवं गायक बालाभाऊ साहब उमड़ेकर की पौत्री एवं श्रीराम उमड़ेकर की पु‍त्री विदुषी गीतिका ने अपने गायन का प्रारंभ राग पूर्वी के साथ किया। गंभीर, भावप्रधान एवं सांध्‍यकालीन इस राग में उन्‍होंने विलंबित खयाल ताल तिलवाड़ा में प्रस्‍तुत किया, जिसके बोल ऐ टोनवा कर दे माई.... थे। इसके बाद मध्‍य लय की बंदिश तीन ताल में प्रस्‍तुत की, जिसके बोल काजर कारे अति सुकुमारे....थे। गीतिका ने श्रृंगार रस की इस बंदिश में नयनों के सौंदर्य को सुमधुर स्‍वरों में प्रस्‍तुत किया।

अगली प्रस्‍तुति खमाज में टप्‍पा की थी, जो पारम्‍परिक ग्‍वालियर घराने का था, इसके बोल चाल पैचानी निया.... थे। उनके साथ तबले पर अशेष उपाध्‍याय एवं हारमोनियम पर डॉ. रचना शर्मा ने सधी हुई संगत दी। अगली संगीत सभा तबला वादन की थी। इन्‍दौर के ही गुणी एवं ख्‍यात तबला वादक हितेन्‍द्र दीक्षित ने अपनी उंगलियों से ताल का जादू बिखेरा। उन्‍होंने अपना तबला वादन तीन ताल में प्रस्‍तुत किया। पारम्‍परिक रूप में पेशकार के साथ पंजाब घराने की विशेषता सुनने को मिली, जिसमें विलंबित लय में बढत करते हुए तिहाईयों से श्रोताओं को आनन्दित कर दिया। वादन को आगे बढ़ाते हुए तिस्र जाति में रेला, चतुश्र जाति में चलन, रेले, कायदों से पंजाब घराने की काट परज सुनाकर अपने तीव्र तबला वादन को चरम पर पहुंचाया। अपने वादन में विशेष रूप से मिश्र जाति एवं मध्य लय में संकीर्ण जाति में टुकड़े, चक्करदारों से वादन का प्रथम चरण का समापन कर द्रुत तीन ताल में टुकड़े अनाघात, टुकड़े बेदम चक्करदार, फरमाईशी चक्करदार, जिसमें पुराने उस्‍तादों की बंदिशें जैसे करीम बख्श पेरना, फिरोज खां डाढी एवं अपने उस्ताद अल्ला रक्‍खां की स्‍मृतियों को जीवंत कर दिया। इतने ओजस्‍वी तबला वादन ने मौसम की ठंडक में गरमाहट घोल दी। यह तबला वादन की सभा इन्‍दौर के सुनकार लम्‍बे समय तक याद रखेंगे। उनके साथ हारमोनियम पर दीपक खसरावल ने योग्य संगत दी।

दूसरे दिवस की तीसरी संगीत सभा कोलकाता की सुविख्‍यात गायिका विदुषी संहिता नन्‍दी के गायन की रही। किराना घराना की गुणी गायिका विदुषी संहिता नन्‍दी पंडित विनायक तोरवी एवं उस्‍ताद मश्‍कूर अली खान की शिष्‍या रही हैं। अपने घराने की समृद्ध परम्‍परा और पारम्‍परिक बंदिशों के साथ जब संहिता मंच पर नमूदार हुईं तो इन्‍दौर के सुनकारों ने उनका अभिनन्‍दन किया। उन्‍होंने अपने गायन का प्रारम्‍भ राग मालकौंस के साथ किया। अत्‍यंत प्राचीन, गंभीर एवं मधुर राग में उस्‍ताद आमिर खां की बंदिश जिनके मन राग बिराजे.... विलंबित एक ताल में प्रस्‍तुत करते हुए अपनी सुदीर्घ साधना और परम्‍परा से श्रोताओं को परिचित कराया। द्रुत बंदिश तीन ताल में निबद्ध थी, जो उस्‍ताद आमिर खां की ही बंदिश थी, जिसके बोल आज मोरे घर आइल बलमा.... थे। श्रृंगार रस की इस अति सुंदर बंदिश ने श्रोताओं को आनन्‍द से भर दिया। अगली प्रस्‍तुति 1955 में आई फिल्‍म झनक झनक पायल बाजे में उस्‍ताद आमिर खां का गाया गीत झनक झनक पायल बाजे.... जो राग अड़ाना में है, गाकर श्रोताओं के ह्रदय को झंकृत कर दिया। अंत में उन्‍होंने भजन के साथ प्रस्‍तुति को विराम दिया। उनके साथ तबले पर सुविख्‍यात तबला वादक सलीम अल्‍लाहवाले, हारमोनियम पर विवेक जैन एवं सारंगी पर आबिद हुसैन ने संगत दी।

अंतिम संगीत सभा वृन्‍दावन के जे.एस.आर. मधुकर के गायन की रही। ब्रज की सुगन्‍ध से सराबोर मधुकर के गायन ने जहां एक ओर सभा में आध्‍यात्मिक अनुभूतियों का प्रवाह किया, वहीं दूसरी ओर स्‍वर-लहरियों से आत्‍ममुग्‍ध कर दिया। उन्‍होंने अपने गायन का प्रारम्‍भ राग गोरख कल्‍याण की रचना 'गोकुल की पनिहारी पनिया भरण चाली....' से किया। इसके बाद राग मालकौस में करिये गुरु को मान.... से गुरु का स्‍मरण करते हुए वंदन किया। अगले क्रम में दरबारी कान्‍हाड़ा राग में गागरी नाही भरण देत.... श्रृंगार रस की रचना के माध्‍यम से चंचल श्रीकृष्ण का गोपियों को तंग करना और गोपी का बहाने से कृष्ण के साथ रास - रंग का आनन्‍द लेना प्रस्‍तुत किया गया। अंत में उन्‍होंने राग सिंधु भैरवी में ठुमरी प्रस्‍तुत की, जिसके बोल तती रो रो मैं बांट निहारा, सांवल मोर मुहारा.... थे। इस रचना में विरह और प्रतीक्षा का भाव है, जिसमें सांवले प्रियतम की राह देखते हुए भक्त की व्याकुलता का सुंदर चित्रण था।

हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर