मप्रः भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रामाणिक तथ्यों को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने पर हुआ विमर्श
- उच्च शिक्षा विभाग एवं हिंदी ग्रंथ अकादमी की दो दिवसीय कार्यशाला संपन्न
भोपाल, 25 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश में उच्च शिक्षा विभाग एवं हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, भोपाल में पुस्तक लेखन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला रविवार को संपन्न हुई। कार्यशाला में गुणवत्तापूर्ण एवं त्रुटिरहित पाठ्यपुस्तक लेखन, प्रामाणिक शोध सामग्री के उपयोग तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में समाहित करने पर विचार-विमर्श किया गया।
उच्च शिक्षा आयुक्त प्रबल सिपाहा ने कहा कि शोध संबंधी सामग्री के प्रामाणिक होने के बाद ही उसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। उच्च शिक्षा विभाग के ओएसडी दिनेश दवे ने बताया कि कार्यशाला में संकायवार एवं विषयवार भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा के साथ लेखकों को प्रामाणिक सामग्री, भाषा-शैली, प्रश्नों, गतिविधियों और अभ्यासों के चयन के संबंध में मार्गदर्शन दिया गया। उन्होंने कहा कि पुस्तक लेखन का उद्देश्य विद्यार्थियों को दीर्घकाल तक गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक मार्गदर्शन उपलब्ध कराना है।
मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के संचालक डॉ. अशोक कड़ेल ने कहा कि विद्यार्थियों को सत्र प्रारंभ होते ही पुस्तकें उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तृतीय वर्ष की पाठ्यपुस्तकों के लेखन पर कार्य किया जाएगा। पुस्तकों में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रामाणिक तथ्यों को समाहित करते हुए विषय विशेषज्ञों एवं लेखकों के समन्वय से विद्यार्थियों के हित में लेखन किया जाएगा।
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि देश को बदलने के लिए शिक्षा में परिवर्तन आवश्यक है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल तत्वों को समझकर पाठ्यपुस्तकों में समाहित करने तथा प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष की पुस्तकों में विषयवस्तु की क्रमबद्धता बनाए रखने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि पुस्तकों में भारतीयता, मानवीय दृष्टिकोण, आध्यात्मिक विकास, बहुविषयक दृष्टिकोण एवं व्यावहारिक गतिविधियों को स्थान मिलना चाहिए। प्रत्येक पाठ के बाद विद्यार्थियों के चिंतन, विश्लेषण एवं समग्र विकास को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियां शामिल करने की आवश्यकता भी बताई।
शिक्षाविद् डॉ. चांदकिरण सलूजा ने कार्यपुस्तिका आधारित लेखन, स्वयं प्रश्न बनाने एवं उत्तर लिखने, परिस्थितिजन्य प्रश्नों तथा गतिविधि आधारित शिक्षण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पुस्तकों में ऐसी गतिविधियां होनी चाहिए, जो विद्यार्थियों में सामूहिक कार्य, चिंतन और विश्लेषण की क्षमता विकसित करें। साथ ही, पुस्तक लेखन में पुरातात्विक प्रमाणों एवं प्रामाणिक स्रोतों का उपयोग किया जाना चाहिए।
विषय विशेषज्ञों ने दिया मार्गदर्शन
डॉ. रमेश चंद्र भारद्वाज ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारभूमि, प्रामाणिक स्रोतों, प्राचीन भारतीय साहित्य के काल विभाजन तथा ऐतिहासिक साक्ष्यों पर प्रकाश डाला।
डॉ. मीनाक्षी ने भारतीय गणितीय परंपरा, अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित एवं खगोल विज्ञान के विकास और विभिन्न सभ्यताओं में भारतीय गणित के प्रभाव से संबंधित साहित्यिक प्रमाण प्रस्तुत किए।कार्यशाला में लेखकों ने प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकों, संदर्भ ग्रंथों तथा विषयवार शब्दावली के चयन से संबंधित प्रश्न रखे, जिनका विषय विशेषज्ञों ने समाधान किया।
दूसरे दिन संकायवार समूह चर्चा भी आयोजित की गई। इसमें डॉ. अखिलेश कुमार पाण्डेय, डॉ. हरीश व्यास, डॉ. खेमसिंह डहेरिया, डॉ. राकेश ढण्ड एवं डॉ. अलकेश चतुर्वेदी ने समन्वयक के रूप में नेतृत्व किया। कार्यशाला में उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, भोपाल में दिसंबर 2026 में आयोजित होने वाली इंडियन कॉमर्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय कार्यशाला के ब्रोशर का विमोचन भी किया गया।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

