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पशुपालन विभाग में पदोन्नति के एक महीने बाद रिवर्ट की तैयारी

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पशुपालन विभाग में पदोन्नति के एक महीने बाद रिवर्ट की तैयारी


वेटरिनरी डॉक्टर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री और सामान्य प्रशासन विभाग से लगाई गुहार

भोपाल, 16 सितंबर (हि.स.)। मध्यप्रदेश के पशुपालन एवं डेयरी विभाग में अधिकारियों की पदोन्नति का विवाद एक बार फिर गहरा गया है। पदोन्नति प्रक्रिया पूरी होने के करीब एक महीने बाद पदोन्नत अधिकारियों को वापस पूर्व पद पर भेजे जाने की संभावित कार्रवाई की चर्चा के बीच मध्यप्रदेश वेटरिनरी डॉक्टर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री और सामान्य प्रशासन विभाग के सामने अपना पक्ष रखा है। एसोसिएशन का कहना है कि किसी भी पदोन्नत अधिकारी के विरुद्ध प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। संगठन ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और संवैधानिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा मामला बताते हुए शासन से हस्तक्षेप की मांग की है।

पहले सुनें, फिर कार्रवाई करें

मध्यप्रदेश वेटरिनरी डॉक्टर्स एसोसिएशन, भोपाल ने मुख्यमंत्री और सामान्य प्रशासन विभाग को भेजे अभ्यावेदन में ‘अवसर देकर सुनवाई’ और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का हवाला दिया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. हीरा सिंह भंवर के अनुसार पदोन्नत अधिकारियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की कार्रवाई से पहले उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। संगठन का कहना है कि पद की गरिमा और संवैधानिक प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए सुनवाई का सिद्धांत लागू होना चाहिए। इस संबंध में एसोसिएशन की ओर से 21 अगस्त 2026 को भी शासन को पत्र दिया जा चुका है।

396 अधिकारियों की सूची ने बढ़ाया विवाद

एसोसिएशन के अनुसार विवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष संयुक्त विचारण सूची और दिसंबर 2025 की ग्रेडेशन सूची से जुड़ा है। संगठन का दावा है कि यदि एक जातिगत संगठन की आपत्ति को आधार बनाकर केवल 396 अधिकारियों पर विचार किया जाता है, तो पदोन्नति में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर असंतुलन पैदा हो सकता है।

एसोसिएशन के मुताबिक इस स्थिति में 154 सामान्य और पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों के पदोन्नत होने की संभावना बनती है, जबकि अनुसूचित जाति वर्ग से महज 5 और अनुसूचित जनजाति वर्ग से 4 अधिकारी सूची में शामिल हो सकते हैं। संगठन ने इन आंकड़ों के आधार पर अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व करीब 2.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति का करीब 2.1 प्रतिशत बताया है। संगठन का तर्क है कि यह स्थिति संवैधानिक प्रतिनिधित्व के उसके दावे के अनुरूप नहीं है। इसी वजह से वह संवर्गवार विचारण सूची बनाए जाने का समर्थन कर रहा है और कह रहा है कि मौजूदा पदोन्नति प्रक्रिया में इसी व्यवस्था को अपनाया गया है।

आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों का हवाला

एसोसिएशन ने अपने अभ्यावेदन में मध्यप्रदेश लोक सेवा संबंधी आरक्षण कानून और संविधान के प्रावधानों का उल्लेख किया है। संगठन ने कहा है कि मध्यप्रदेश लोक सेवा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण से संबंधित वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं तथा संविधान का अनुच्छेद 16(4ए) पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित राज्य की शक्ति का आधार प्रदान करता है।

पदोन्नति का यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में पदोन्नति व्यवस्था पहले से ही लंबे न्यायिक विवाद की पृष्ठभूमि से गुजर रही है। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा जारी 2025 के पदोन्नति नियमों की प्रस्तावना में 2016 के मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में लंबित एसएलपी क्रमांक 13954/2016 का उल्लेख है। उसी दस्तावेज में 12 मई 2016 के सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के तहत उस समय की स्थिति बनाए रखने का उल्लेख भी है।

2025 के पदोन्नति नियम भी विवाद के केंद्र में

एसोसिएशन ने मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम, 2025 की विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए कहा है कि नियमों के उद्देश्य और प्रावधानों को पहले स्पष्ट रूप से देखा जाना चाहिए और उसके बाद संबंधित प्रक्रिया के प्रावधानों को लागू किया जाना चाहिए। संगठन विशेष रूप से नियम की कंडिका 4 और 6 के उद्देश्यों पर पहले विचार किए जाने तथा उसके बाद कंडिका 11(4) के आधार पर कार्रवाई किए जाने की बात कह रहा है। उसका कहना है कि पदोन्नति प्रक्रिया में संवैधानिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट के आदेश का भी उल्लेख

एसोसिएशन ने अपने अभ्यावेदन में जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के आरक्षण संबंधी आदेश का भी उल्लेख किया है। संगठन का कहना है कि अधिकतम 50 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित न्यायिक व्यवस्था के संदर्भ में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पशुपालन एवं डेयरी विभाग अपने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारियों को वास्तविक रूप से कितना प्रतिनिधित्व दे रहा है। यहां विवाद का मूल प्रश्न सिर्फ पदोन्नति पाने वाले अधिकारियों के पद पर बने रहने तक सीमित नहीं है। एसोसिएशन इसे विभागीय पदोन्नति प्रक्रिया में संवैधानिक प्रतिनिधित्व के अनुपात और आरक्षित वर्ग के अधिकारियों के अवसर से जोड़कर देख रहा है।

राज्यपाल से लेकर आयोग तक अभ्यावेदन

वेटरिनरी डॉक्टर्स एसोसिएशन का कहना है कि उसने इस मुद्दे पर राज्यपाल, अनुसूचित जनजाति आयोग और संबंधित जनजाति प्रकोष्ठ सहित विभिन्न संवैधानिक एवं प्रशासनिक संस्थाओं को भी अभ्यावेदन प्रस्तुत किए हैं। संगठन का कहना है कि वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारियों के संवैधानिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को लेकर लगातार शासन के सामने अपनी बात रख रहा है। अब संगठन ने प्रदेश स्तर पर आगे की रणनीति तैयार करने की बात कही है।

विभाग के सामने दोहरा सवाल

पशुपालन एवं डेयरी विभाग के सामने अब दो स्तरों पर सवाल खड़े हो गए हैं। पहला, पदोन्नति प्राप्त कर चुके अधिकारियों के संबंध में यदि कोई पुनर्विचार या वापसी की कार्रवाई प्रस्तावित है, तो क्या संबंधित अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिलेगा। दूसरा, पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया में आरक्षित वर्गों का संवैधानिक प्रतिनिधित्व किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा। विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर विभिन्न संवर्गों की पदक्रम सूचियां उपलब्ध हैं और जुलाई 2026 में वेबसाइट का अंतिम नवीनीकरण दर्ज है।

ऐसे में अब निगाह शासन के अगले कदम पर है। एक ओर पदोन्नति प्रक्रिया को लंबे समय से चली आ रही कानूनी जटिलताओं के बीच आगे बढ़ाने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर पदोन्नत अधिकारियों के अधिकार और आरक्षित वर्गों के संवैधानिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान करना भी आवश्यक होगा। वेटरिनरी डॉक्टर्स एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि वह अपने संवर्ग में संवैधानिक प्रतिनिधित्व की रक्षा के मुद्दे पर पीछे हटने के बजाय प्रदेश स्तर पर आगे की रणनीति बनाएगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन इस पूरे विवाद में पदोन्नत अधिकारियों को सुनवाई का अवसर देता है या नहीं और विभागीय पदोन्नति में प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर क्या निर्णय लेता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी