भोपाल: आधी रात बच्चों की तलाश में निकला बाल आयोग, कहीं बीड़ी-सिगरेट बेचता मिला मासूम तो कहीं शराब के नशे में मिली किशोरी
छह नंबर में 10 साल से छोटे बच्चे को पान की दुकान पर सिगरेट-बीड़ी बेचते पकड़ा, परिवार को चेतावनी; डॉ. निवेदिता शर्मा बोलीं, “यह उम्र पढ़ने की है, काम करने की नहीं”, पढ़ाई में आर्थिक बाधा है तो शासन कराएगा व्यवस्था
भोपाल, 27 सितंबर (हि.स.)। राजधानी की रात में जब शहर अपने घरों में सिमटने लगता है, तब मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की नजर उन बच्चों तक पहुंच रही है, जिनका बचपन किसी दुकान, सड़क या नशे के अड्डे के आसपास खोता दिखाई दे रहा है। छह नंबर क्षेत्र में रात 11 बजे के बाद बाल आयोग की औचक कार्रवाई में 10 वर्ष से भी कम उम्र का एक बालक पान की दुकान पर सिगरेट और बीड़ी बेचते मिला। बच्चे के हाथ में किताब की जगह तंबाकू उत्पाद देखकर आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा ने तत्काल हस्तक्षेप किया। परिवार को सख्त हिदायत दी गई कि बच्चे को दोबारा इस तरह काम करते पाया गया तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस कार्रवाई का सबसे संवेदनशील पहलू यह रहा कि आयोग ने परिवार को सिर्फ चेतावनी देकर मामला समाप्त नहीं किया। डॉ. शर्मा ने परिवार से कहा कि यह उम्र बच्चे के पढ़ने की है। यदि आर्थिक परेशानी के कारण परिवार उसे पढ़ाने में सक्षम नहीं है तो इसकी जानकारी दी जाए। बच्चे को पिछड़ा वर्ग से संबंधित छात्रावास में प्रवेश दिलाकर राज्य शासन की व्यवस्था से उसकी शिक्षा सुनिश्चित कराने की दिशा में कदम उठाया जाएगा।
यह घटना उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब राजधानी में कुछ ही समय पहले आयोग की अध्यक्ष को शराब की दुकान के बाहर एक नाबालिग किशोरी सिगरेट और शराब का सेवन करते मिली थी। वहां भी डॉ. शर्मा ने मौके पर हस्तक्षेप करते हुए पुलिस को बुलाया और किशोरी को पुलिस के हवाले किया। यानी बाल आयोग की निगाह में बच्चों तक नशे की पहुंच और बच्चों का असुरक्षित परिस्थितियों में पहुंचना गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।
पान की दुकान पर मासूम, हाथ में सिगरेट-बीड़ी
उल्लेखनीय है कि छह नंबर क्षेत्र में देर रात की औचक कार्रवाई के दौरान जब आयोग की टीम पान की दुकान तक पहुंची तो वहां 10 वर्ष से कम उम्र का बालक काम करता मिला। वह सिगरेट और बीड़ी बेच रहा था। उम्र इतनी कम थी कि यह दृश्य अपने आप में कई सवाल खड़े करने वाला था।
डॉ. निवेदिता शर्मा ने बच्चे की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए परिवार से बातचीत की। परिवार को समझाया गया कि छोटे बच्चे को इस तरह दुकान पर बैठाकर काम कराना उसके बचपन और शिक्षा दोनों को प्रभावित करता है। उसे इस उम्र में कमाई के काम से दूर रखकर विद्यालय और पढ़ाई से जोड़ना जरूरी है। परिवार को स्पष्ट चेतावनी भी दी गई कि भविष्य में यदि बच्चा फिर इसी तरह दुकान पर काम करता मिला तो आयोग कानूनी कार्रवाई के लिए मजबूर होगा।
पढ़ा नहीं पा रहे हैं तो हमें बताइए
कार्रवाई का मानवीय पक्ष उस समय सामने आया जब डॉ. शर्मा ने परिवार की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा। उन्होंने कहा कि यदि परिवार बच्चे को पढ़ाने में सक्षम नहीं है तो आर्थिक परेशानी को छिपाने की जरूरत नहीं है। आयोग को जानकारी दी जाए, ताकि शासन की उपलब्ध व्यवस्थाओं के माध्यम से बच्चे की शिक्षा की व्यवस्था की जा सके। उन्होंने बच्चे को पिछड़ा वर्ग से संबंधित छात्रावास में भर्ती कराकर राज्य शासन की व्यवस्था के माध्यम से पढ़ाने की दिशा में सहायता का आश्वासन दिया।
अब इस पहल के जरिए एक स्पष्ट संदेश देने का काम बाल आयोग ने किया है कि गरीबी बच्चे को काम पर भेजने की मजबूरी बने, उससे पहले व्यवस्था बच्चे की शिक्षा का रास्ता तलाशे।
पांच नंबर में आधी रात नशे में मिली थी नाबालिग किशोरी
छह नंबर की इस कार्रवाई से पहले राजधानी के पांच नंबर क्षेत्र में भी बाल आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा की औचक कार्रवाई चर्चा में रही थी। सितंबर में आधी रात करीब 12 बजे शराब की दुकान के बाहर एक नाबालिग बालिका लड़कों के साथ बाइक पर बैठी सिगरेट और शराब पीती मिली थी। डॉ. शर्मा की नजर पड़ने पर उन्होंने गाड़ी रुकवाकर बालिका से पूछताछ की। स्थिति संदिग्ध लगने पर 100 डायल कर पुलिस को बुलाया गया। मौके पर मौजूद कुछ लोग भाग गए, जबकि पुलिस ने एक बालिग युवक को पकड़ लिया।पूछताछ के दौरान किशोरी के बयानों में भी विरोधाभास सामने आया। उसने अपने निवास के बारे में अलग-अलग पते बताए। उसने पढ़ाई छोड़कर नौकरी करने की बात भी कही। मामले में पुलिस ने उसकी उम्र, पहचान, परिवार, निवास और रोजगार से जुड़े तथ्यों की जांच शुरू की।
एक जगह बच्ची, दूसरी जगह मासूम
पांच नंबर की घटना में नाबालिग किशोरी शराब और सिगरेट के साथ मिली और छह नंबर में 10 वर्ष से कम उम्र का बच्चा उसी रात के समय से जुड़े माहौल में सिगरेट-बीड़ी बेचता मिला। दोनों घटनाओं में परिस्थितियां अलग हैं, मगर एक सवाल समान है: बच्चों तक नशे की पहुंच और बच्चों का नशे से जुड़े माहौल में पहुंचना कैसे रोका जाए?
दरअसल, बाल आयोग की हालिया कार्रवाई इसी सवाल के इर्द-गिर्द दिखाई देती है। कहीं बच्चे को नशे के सेवन से बचाने के लिए पुलिस को बुलाया जा रहा है तो कहीं बच्चे को नशे के उत्पाद बेचने के काम से हटाकर शिक्षा की ओर ले जाने की कोशिश की जा रही है।
कार्रवाई के साथ पुनर्वास पर भी जोर
डॉ. निवेदिता शर्मा ने मई 2026 में मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष का पद संभालने के बाद बच्चों के अधिकारों की रक्षा, सुरक्षा और समग्र विकास को प्राथमिकता बताते हुए शिकायतों के समयबद्ध निराकरण और सक्रिय समन्वय पर जोर दिया है। हाल की कार्रवाइयों में भी इसी दृष्टिकोण की झलक दिखाई देती है। मुरैना में मदरसे के निरीक्षण से लेकर प्रदेश भर में तमाम जगह स्कूलों, छात्रावासों और बाल संरक्षण से जुड़े संस्थानों की पड़ताल तक आयोग की सक्रियता सामने आई है। इन कार्रवाइयों में बच्चों की वास्तविक स्थिति, शिक्षा और सुरक्षा को केंद्र में रखा गया है।
फिलहाल राजधानी में पांच नंबर क्षेत्र की नाबालिग किशोरी से लेकर छह नंबर की पान दुकान तक सामने आई घटनाएं यह सवाल छोड़ती हैं कि बच्चों को नशे और असुरक्षित माहौल से बचाने के लिए परिवार, समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी कितनी बड़ी है। बाल आयोग की इन औचक कार्रवाइयों ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि बच्चों के बचपन से जुड़ा कोई भी मामला रात के अंधेरे में अनदेखा नहीं रहने दिया जाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

