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मप्रः विधानसभा अध्यक्ष तोमर ने किया ‘पिता मेरे स्मृति में पिता’ पुस्तक का विमोचन

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मप्रः विधानसभा अध्यक्ष तोमर ने किया ‘पिता मेरे स्मृति में पिता’ पुस्तक का विमोचन


इंदौर, 04 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने रविवार को इंदौर में पिता के त्याग, तपस्या, संघर्ष, समर्पण और परिवार के प्रति उनकी अनकही जिम्मेदारियों को शब्दों में अभिव्यक्त करने वाली वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. स्वाति तिवारी द्वारा संपादित पुस्तक ‘पिता मेरे स्मृति में पिता’ का विमोचन किया।

पितृ पक्ष के अवसर पर आयोजित इस भावपूर्ण समारोह की अध्यक्षता जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने की। कार्यक्रम में पिता के जीवन, उनके त्याग, संघर्ष, समर्पण और परिवार के प्रति योगदान को केंद्र में रखते हुए पुस्तक के साहित्यिक एवं सामाजिक महत्व पर विचार व्यक्त किए गए। इस साहित्यिक कार्यक्रम में सांसद शंकर लालवानी, विधायक उषा ठाकुर, पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता, संभागायुक्त भास्कर लाक्षाकार, पूर्व जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव, पुस्तक की संपादक स्वाति तिवारी, मीडियावाला ग्रुप के सुरेश तिवारी, डॉ. अपूर्व पुराणिक विशेष रूप से उपस्थित थे।

मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने पुस्तक का विमोचन करते हुए कहा कि पितृ पक्ष में अपने पितरों को शब्द सुमन अर्पित करने का अवसर मिलना हम सभी के लिए सौभाग्य और प्रसन्नता का विषय है। ‘पिता मेरे’ पुस्तक पिता के त्याग, तपस्या, संघर्ष, समर्पण और परिवार के प्रति उनकी अनकही जिम्मेदारियों को अभिव्यक्त करने का सराहनीय प्रयास है। यह पुस्तक नई पीढ़ी को पिता की भूमिका और उनके जीवन संघर्ष को समझने तथा परिवार और समाज के प्रति अपने दायित्वों का बोध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

तोमर ने कहा कि सृष्टि की रचना में माता और पिता दोनों का समान योगदान है, लेकिन साहित्य और समाज में मां पर जितना लिखा गया है, उसकी तुलना में पिता पर अपेक्षाकृत कम लेखन हुआ है। हमारी गौरवशाली परंपराओं, संस्कृति और अध्यात्म में मां को विशेष स्थान दिया गया है। मां को पृथ्वी और वात्सल्य का प्रतीक माना गया है। मां का कर्मयोग, परिवार के प्रति समर्पण और उसकी करुणा सदैव अभिव्यक्ति का विषय रहे हैं, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि पिता के बिना मां की भूमिका और मां के बिना पिता की भूमिका अधूरी है।

उन्होंने कहा कि पिता का जीवन संघर्ष, समर्पण और तपस्या का पर्याय है। पिता बिना कुछ कहे और अपनी तकलीफों को जाहिर किए परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करता है। जहां मां परिवार के आंतरिक दायित्वों और भावनात्मक पक्ष को संभालती है, वहीं पिता जीवन की अनेक बाहरी चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए परिवार के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए निरंतर प्रयास करता है। उन्होंने कहा कि जिन परिवारों में असमय पिता का साया उठ जाता है, उन परिवारों को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, यह सहज ही समझा जा सकता है। ऐसी माताएं भी अभिनंदन की पात्र हैं, जो पिता के अभाव में पूरे परिवार का पालन-पोषण करती हैं और बच्चों को जीवन में आगे बढ़ने योग्य बनाती हैं।

विधानसभा अध्यक्ष तोमर ने कहा कि पिता और पुत्र के बीच उम्र का अंतर समय के साथ बढ़ता जाता है। कई बार नई पीढ़ी को लगता है कि पिता की सोच पुरानी है और वे आधुनिक समय तथा तकनीक को उतनी अच्छी तरह नहीं समझते, लेकिन पिता अपने अनुभवों के आधार पर बच्चों को जीवन की चुनौतियों और संभावित खतरों से आगाह करता है। वह बच्चों को आगे बढ़ने, प्रतिस्पर्धा में सफलता हासिल करने के लिए प्रेरित करता है और साथ ही सावधानी बरतने की सीख भी देता है।

उन्होंने कहा कि अक्सर माता-पिता की भूमिका का वास्तविक महत्व उनके जाने के बाद समझ में आता है। जब व्यक्ति स्वयं अपने बच्चों का पालन-पोषण करता है, उनकी शिक्षा और भविष्य की जिम्मेदारियां निभाता है, तब उसे एहसास होता है कि सीमित आय और संसाधनों के बावजूद उसके पिता ने किस प्रकार परिवार की सभी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया होगा। उस समय पिता की कही हुई बातें और उनकी सीख बार-बार याद आती हैं। उन्होंने कहा कि वे परिवार सबसे सौभाग्यशाली हैं, जिनके बच्चे माता-पिता के जीवनकाल में ही उनके योगदान और महत्व को समझ लेते हैं।

तोमर ने कहा कि वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में परिवार, समाज और विभिन्न क्षेत्रों में मूल्यों एवं संस्कारों में गिरावट देखने को मिल रही है। ऐसे समय में ‘पिता मेरे’ जैसी पुस्तक परिवारों में संस्कारों को मजबूत करने और नई पीढ़ी को माता-पिता के प्रति अपने दायित्वों का बोध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह पुस्तक वर्तमान समय की आवश्यकता के अनुरूप एक सार्थक चिंतन प्रस्तुत करती है।

उन्होंने पुस्तक की रचनाकार स्वाति तिवारी तथा इस विचार को साकार करने में सहयोगी सभी लोगों का अभिनंदन करते हुए कहा कि पिता जैसे व्यापक व्यक्तित्व को शब्दों में अभिव्यक्त करना आसान नहीं है। ‘पिता’ शब्द भले ही दो अक्षरों का हो, लेकिन इसके भीतर त्याग, तप, संघर्ष, समर्पण और जिम्मेदारियों का अथाह संसार समाहित है।

तोमर ने कहा कि इंदौर स्वच्छता के क्षेत्र में देश में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है। यहां के समाजसेवी, जनप्रतिनिधि, व्यापारी और उद्योगपति यदि संकल्प लें, तो इंदौर को स्वच्छता की तरह संस्कारों के क्षेत्र में भी देश में अग्रणी बनाया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि ‘पिता मेरे’ पुस्तक अधिक से अधिक युवाओं और नई पीढ़ी तक पहुंचे, इसके लिए समाज और सरकार दोनों स्तरों पर प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जब यह पुस्तक संस्कार का माध्यम बनेगी और घर-घर पढ़ी जाएगी, तब समाज इस पुनीत प्रयास का सदैव ऋणी रहेगा।

जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने कहा कि जब भी त्याग, समर्पण, संघर्ष और चुनौतियों की बात होती है, तो हमारे मन में सबसे पहले पिता का स्मरण आता है। जीवन में कोई चुनौती आने पर जो व्यक्ति अपने आशीर्वाद, विश्वास और संबल से हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, वह पिता होता है। पिता का सपना, लक्ष्य और उद्देश्य हमेशा अपने परिवार को आगे बढ़ाने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के लिए सकारात्मक योगदान देना होता है।

उन्होंने कहा कि पिता का जीवन केवल परिवार तक सीमित नहीं होता। वह अपने परिवार के भविष्य की चिंता करता है, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है और राष्ट्रहित के बारे में भी सोचता है। त्याग, समर्पण, अनुशासन और संघर्ष की अनेक विशेषताएं एक पिता के व्यक्तित्व में समाहित होती हैं, जिन्हें समझने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है।

मंत्री सिलावट ने कहा कि वर्तमान समय में अपने पिता की स्मृति में पुस्तक का प्रकाशन एक सराहनीय पहल है। यह पुस्तक केवल स्मृतियों का संकलन नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और संघर्ष की प्रेरणादायी कहानी है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए नींव के पत्थर की तरह साबित होगी। आज सूचना और तकनीक के युग में दुनिया की तमाम जानकारियां एक क्षण में उपलब्ध हो जाती हैं, लेकिन अपने पिता के जीवन, उनके आचरण, संघर्ष तथा परिवार एवं समाज के प्रति उनके योगदान को जानने-समझने का अवसर अपेक्षाकृत कम मिलता है। इस दृष्टि से यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में माता-पिता का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना एक पवित्र परंपरा है। मां के वात्सल्य और स्नेह की स्मृतियां तो अक्सर सामने आती हैं, लेकिन पिता के त्याग, संघर्ष और भावनात्मक पक्ष को भी उतनी ही आत्मीयता से याद किया जाना चाहिए। मां और पिता दोनों का जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।

संभागायुक्त भास्कर लाक्षाकार ने कहा कि जीवन में कुछ अवसर ऐसे होते हैं, जब हम अपनी उन भावनाओं को व्यक्त कर पाते हैं, जिन्हें सामान्यतः कह नहीं पाते। मां और संतान के बीच स्नेह एवं वात्सल्य की अभिव्यक्ति साहित्य, कविताओं, कहानियों और फिल्मों में सहज रूप से देखने को मिलती है, लेकिन पिता और पुत्र अथवा पिता और पुत्री के बीच के स्नेह, संवेदनाओं और भावनात्मक संबंधों को अभिव्यक्त करने वाले साहित्यिक एवं कलात्मक माध्यम अपेक्षाकृत कम हैं।

उन्होंने कहा कि पिता के व्यक्तित्व का वर्णन करना अत्यंत कठिन कार्य है। पूर्व वक्ता डॉ. पुराणिक द्वारा उद्धृत भाव ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मां का स्थान धरती के समान महान है और पिता का व्यक्तित्व आकाश से भी ऊंचा है। ऐसे व्यक्तित्व का बखान कर पाना किसी आकाश-कुसुम को लाने जैसा असंभव प्रतीत होता है।

लाक्षाकार ने कहा कि पुस्तक में संकलित विभिन्न संस्मरण केवल पिता के गुणों का बखान नहीं करते, बल्कि कई लेखकों ने अत्यंत निर्मम और आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने पिता के व्यक्तित्व का विश्लेषण भी किया है। यही इस पुस्तक और संस्मरणों के संकलन को विशिष्ट बनाता है। यह पुस्तक उन भावनात्मक सीमाओं को छूने का प्रयास करती है, जिन्हें सामान्यतः अभिव्यक्त करना कठिन होता है।

कार्यक्रम में डॉ. पुराणिक ने कहा कि पिता जीवन की पहली पाठशाला है। वह मौनशिल्पी है। पिता संबल है, पिता शक्ति है। पिता को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है। पिता प्रजापति की तरह होते हैं और वह सबका पालन करते हैं।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार एवं पुस्तक की संपादक स्वाति तिवारी ने किया। मीडिया वाला ग्रुप के सुरेश तिवारी ने पुस्तक के संबंध में जानकारी दी। कार्यक्रम के अंत में पूर्व जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव ने आभार व्यक्त किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर