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निज जनों पर कृपा हेतु अवतरित होते हैं, भगवान् वामन, श्री कृष्ण और श्रीराम - डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

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निज जनों पर कृपा हेतु अवतरित होते हैं, भगवान् वामन, श्री कृष्ण और श्रीराम - डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा


झाबुआ, 23 सितम्बर (हि.स.)। सच्चिदानन्दघन, सर्वशक्तिमान परमेश्वर परमब्रह्म परमात्मा, पुराण पुरुषोत्तम, दैवकीनंदन भगवान् श्रीकृष्ण का इस धरा धाम पर अवतरण आध्यात्मिक जगत् की दिव्यातिदिव्य, अद्भुततम, अनिर्वचनीय, अकल्पनीय विस्मयकारी एवं एकमात्र महानतम घटना है। इस धरा धाम पर अवतरित होकर प्रेम राज्य की स्थापना और अपने निज जनों को प्रेमानंद प्रदान करने वाले भगवान् श्री कृष्ण आसुरी शक्तियों को समाप्त कर देवीय शक्तियों से संपन्न धर्म युक्त साम्राज्य स्थापित करते हैं।

उक्त विचार श्रीमद्भागवत कथा वाचक डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा द्वारा श्रीमद्भागवत कथा के दौरान व्यास पीठ से व्यक्त किए गए। शर्मा मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले के थान्दला में श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में श्रीमद्भागवत भक्ति पर्व के अंतर्गत आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवतकथा के चतुर्थ दिवस बुधवार को भगवान् श्री कृष्ण के प्राकट्य की दिव्य कथा का वाचन कर रहे थे। आज कथा में भगवान् श्री कृष्ण श्री वामन और भगवान् श्री राम के अवतरण सहित अन्य प्रसंगों का भी वाचन किया गया।

शर्मा ने कहा कि इस पृथ्वी पर जब जब भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब ही दुष्टों के विनाश के रूप में उनका उद्धार कर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। भगवान् का अवतार उनके कर्म और उनकी लीलाएं बड़ी ही अद्भुत और दिव्य होती है, जिनका स्मरण, कीर्तन करते हुए भक्त जन प्रभु संन्निधि प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होते हैं। इस तरह भगवान् कभी श्रीकृष्ण, कभी श्री राम तो कभी वामन और नरसिंहादि विविध रूपों में इस धरा धाम पर अवतरित होकर अपने प्रेमी भक्तों को अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से आत्मानंद प्रदान, करने के निमित्त युग युग में अवतार ग्रहण करते हैं। जगत् का प्रत्येक जीव आनंद की चाहना रखता है, और सांसारिक सुखों में आनंद ढूंढता है, किंतु वह दिव्यानंद सांसारिक सुखों में है ही नहीं, अपितु प्रभु शरणागति और प्रभु प्रेम में ही निहित है, इसलिए भगवान् अपने शरणागत प्रेमी जीवों की चाहना पूर्ण करने और उनपर कृपावंत होकर सगुण रूप धारण कर अवतरित होते हैं। भगवान् श्री कृष्ण का पृथ्वी पर अवतरण और उनकी लीलाएं दिव्यतम, मधुर और जगत् को आनंद प्रदान करने वाली होती है।

श्रीमद्भागवत कथा वाचन में भगवान् श्रीराम, श्रीकृष्ण और भगवान् वामन के प्राकट्य और उनके अति अद्भुत और दिव्य कर्मों का वाचन करते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि वामन अवतार के माध्यम से जहां भगवान् श्रीकृष्ण ने देवराज इन्द्र के सत्ता मद को चूर चूर किया और महाराज बलि के महादानी होने के अहंकार को दूर किया, श्रीरामावतार के माध्यम से मर्यादा की स्थापना तथा ऋषि गणों सहित भक्तिमती शबरी माता को दर्शन देकर कृतार्थ किया, वहीं श्रीकृष्ण रूप में अवतरित होकर विभिन्न लीलाओं के द्वारा प्रेम की प्यासी जीवात्माओं को प्रेमानंद से परिपूर्ण कर संपूर्ण जगत् में प्रेम राज्य की स्थापना की, साथ ही आसुरी शक्तियों का विनाश कर दिया।

श्री भगवान् धर्म स्थापना हेतु युग युग में अवतार ग्रहण करते हैं, किंतु केवल आसुरी शक्तियों का संहार कर धर्म स्थापना भगवान् का एकमेव लक्ष्य नहीं होता है, बल्कि प्रभु अपने निज जनों को आत्मानंद प्रदान करने हेतु से भी इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं।

शर्मा ने कहा कि यदि केवल दैत्यों, दानवों या राक्षसों का विनाश कर धर्म स्थापना ही निमित्त होता, तो मात्र उसके लिए निर्गुण भगवान् को सगुण रूप धारण करने की आखिर क्या जरूरत हो सकती थी? श्री भगवान् यदि केवल संकल्प भर कर लेते तो क्षणांश में संपूर्ण जगत् की समस्त आसुरी शक्तियां स्वयंमेव समाप्त हो सकती थी और तत्क्षण धर्म राज्य की स्थापना हो जाती। परब्रह्म परमात्मा के लिए धर्म स्थापना बच्चों के खेल से अधिक आखिर और क्या हो सकता है। वस्तुत: वे अपने प्रेमी जनों को आत्मानंद का सुख प्रदान करने के हेतु से ही सगुण साकार रूप धारण कर इस धरा धाम पर पधारते हैं, और प्रेम की प्यासी जीवात्माओं को प्रेमानंद से परिपूर्ण कर संपूर्ण जगत् में प्रेम राज्य की स्थापना करते हैं। भगवान् का पृथ्वी पर अवतरण, उनकी लीलाएं और उपादान सब कुछ दिव्यता लिए हुए होते हैं। कहने को ही भगवान् मनुष्य शरीर सहित विभिन्न शरीर धारण करते हैं, वस्तुत: भगवान् का वह अवतारी शरीर पंचभौतिक होता ही नहीं। उनका वह शरीर दिव्य, चिन्मय प्रकाश रूप है। यही नहीं बल्कि भगवान् की लीला के उपादान गिरिराज गोवर्धन, ब्रज गोपियां, गोप और गौएं सहित श्री वृंदावन धाम सब दिव्यातिदिव्य हैं।

आज कथा में भगवान् श्री वामन, भगवान् श्री राम और भगवान् श्रीकृष्ण के अवतरण प्रसंग सहित गजेन्द्र मोक्ष, देवासुर संग्राम, समुद्र मंथन और मत्स्यावतार की कथा सहित राजा बलि प्रसंग का भी वाचन किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर