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अनूपपुर के देवरी गांव में रावण दहन नहीं, दशानन की होती है पूजा

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अनूपपुर के देवरी गांव में रावण दहन नहीं, दशानन की होती है पूजा


अनूपपुर के देवरी गांव में रावण दहन नहीं, दशानन की होती है पूजा


अनूपपुर, 20 अक्टूबर (हि.स.)। देशभर में विजयदशमी पर बुराई के प्रतीक रावण का दहन कर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के देवरी गांव में दशहरे की परंपरा इस मान्यता से बिल्कुल अलग है। यहां रावण का पुतला जलाया नहीं जाता, बल्कि विधि-विधान से उसकी पूजा-अर्चना की जाती है।

गांव के कुछ आदिवासी परिवार रावण को अपना देवता, पूर्वज और राजा मानते हैं। उनके लिए दशहरा रावण के अंत का नहीं, बल्कि अपनी आस्था, सांस्कृतिक पहचान और पूर्वजों की परंपरा को जीवित रखने का पर्व है। ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत में विश्वास रखने वाले इन परिवारों की यह अनूठी परंपरा विजयदशमी के प्रचलित स्वरूप से अलग अपनी विशिष्ट पहचान रखती है।

7 वर्षों से फिर शुरू हुई पूजा की परंपरा

अनूपपुर जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले देवरी गांव में विजयदशमी के दिन रावण की पूजा करना एक विशिष्ट स्थानीय परंपरा है। ग्रामीणों के अनुसार, उनके पूर्वज भी दशहरे पर रावण की पूजा-अर्चना करते थे, लेकिन कुछ कारणों से बीच में यह परंपरा बंद हो गई थी। अब पिछले 7 वर्षों से नई पीढ़ी ने इस परंपरा को फिर से शुरू किया है। हर विजयदशमी पर रावण की पूजा कर आदिवासी परिवार अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं और पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

रावण को अपना पूर्वज और राजा मानते हैं ग्रामीण

देवरी गांव के लोगों के अनुसार, रावण की माता कैकसी असुर कुल से थीं और दैत्यराज सुमाली की पुत्री थीं। ग्रामीणों की मान्यता है कि कैकसी का संबंध उनके कुल और वंश से रहा है। इसी आधार पर वे रावण को अपने पूर्वजों से जुड़ा हुआ मानते हैं। उनके लिए रावण केवल रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि अपने समुदाय से जुड़ा देवता और राजा भी है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से हुआ था, जो महर्षि पुलस्त्य के पुत्र थे। इस दंपती की संतान के रूप में रावण, कुंभकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण का जन्म हुआ था। देवरी के ग्रामीण इन्हीं पारिवारिक और वंशगत मान्यताओं के आधार पर रावण के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।

संस्कृति और ‘जियो और जीने दो’ का संदेश

ग्रामीणों का कहना है कि रावण की पूजा करने के पीछे उनका उद्देश्य अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखना और ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत को आगे बढ़ाना है। उनके अनुसार, रावण के प्रति आस्था उनकी सामुदायिक पहचान और पूर्वजों से जुड़ी मान्यताओं का हिस्सा है।

ग्राम सचिव सुनील मिश्रा का कहना हैं कि विजयदशमी पर रावण दहन की प्रचलित परंपरा के बीच देवरी गांव में उसकी पूजा किया जाना क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है। यहां दशहरा रावण के पुतले के दहन के बजाय पूजा-अर्चना और अपनी परंपराओं के संरक्षण के रूप में मनाया जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला