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बांधवगढ़ में कॉलरधारी बाघिन सुरक्षित मिली, कंकाल मिलने की आशंका के बाद हरकत में आया पार्क प्रबंधन

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बांधवगढ़ में कॉलरधारी बाघिन सुरक्षित मिली, कंकाल मिलने की आशंका के बाद हरकत में आया पार्क प्रबंधन


उमरिया, 13 जुलाई (हि.स.)। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाल ही में बाघ का कंकाल मिलने के बाद कॉलर आईडी लगी मादा बाघिन को लेकर उठी आशंकाओं के बीच आखिरकार पार्क प्रबंधन ने उसे खोज निकाला। बाघिन के सुरक्षित मिलने के बाद क्षेत्र संचालक डॉ. अनुपम सहाय ने विस्तृत प्रेस नोट जारी कर बताया कि मादा बाघिन पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित है, हालांकि उसके गले में लगा रेडियो कॉलर पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है।

दरअसल, बाघ का कंकाल मिलने के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि कहीं वह कॉलरधारी बाघिन का तो नहीं है। इस खबर के सामने आने के बाद पार्क प्रबंधन ने खोज अभियान को और तेज कर दिया। इसके बाद 12 जुलाई को हाथियों की मदद से बाघिन का पता लगाया गया तथा उसके फोटो और वीडियो भी रिकॉर्ड किए गए।

प्रबंधन के अनुसार, बाघिन के जीपीएस/वीएचएफ रेडियो कॉलर से अंतिम लोकेशन 1 जुलाई 2026 को दोपहर करीब दो बजे प्राप्त हुई थी। इसके बाद सिग्नल पूरी तरह बंद हो गए। उसी दिन वन परिक्षेत्र अधिकारी के नेतृत्व में बीट गार्ड और सुरक्षा श्रमिकों की टीमों ने संभावित क्षेत्र में सर्च अभियान शुरू किया, लेकिन सफलता नहीं मिली।

बाद में खोज अभियान का दायरा बढ़ाते हुए अलग-अलग टीमों का गठन किया गया। लगातार बारिश और दुर्गम वन क्षेत्र के कारण अभियान प्रभावित होता रहा, फिर भी करीब 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगातार तलाशी ली गई। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव अभिरक्षक के मार्गदर्शन में विशेष खोज दल गठित किया गया, जिसमें वन्यप्राणी स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. राजेश तोमर और वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट (डब्ल्यूसीटी) के डॉ. प्रशांत देशमुख को भी शामिल किया गया।

अभियान के दौरान दो प्रशिक्षित हाथियों, महावतों, अतिरिक्त वीएचएफ रिसीवर एंटीना, ट्रैप कैमरों और बाद में डॉग स्क्वाड की भी मदद ली गई। ग्रामीणों से मिली सूचनाओं का विश्लेषण किया गया और अंततः खोजी दल को बाघिन के पदचिह्न मिले। इसके बाद हाथियों की सहायता से उसकी होम रेंज में पहुंचकर बाघिन को सुरक्षित देखा गया।

प्रेस नोट में बताया गया है कि बाघिन पूरी तरह स्वस्थ है, लेकिन उसका रेडियो कॉलर तकनीकी रूप से काम करना बंद कर चुका है। पिछले दस महीनों तक उसकी नियमित मॉनिटरिंग की गई थी। अब आगे की निगरानी के लिए भोपाल मुख्यालय से आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त किए जाएंगे।

रेडियो कॉलर की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बाद रेडियो कॉलर प्रणाली की कार्यक्षमता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। जिस कॉलर के माध्यम से वन्यजीवों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जानी थी, उसके बंद हो जाने से बाघिन की लोकेशन कई दिनों तक ट्रेस नहीं हो सकी। ऐसे में यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि अन्य कॉलरधारी वन्यजीवों के उपकरण भी इसी तरह निष्क्रिय हो जाएं तो उनकी निगरानी किस तरह सुनिश्चित होगी। इस संबंध में विस्तृत स्थिति स्पष्ट करना अब पार्क प्रबंधन के लिए भी चुनौती माना जा रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुरेन्‍द्र त्रिपाठी