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मप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के बंटवारे पर हाईकोर्ट में चुनौती, सरकार को नोटिस

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मप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के बंटवारे पर हाईकोर्ट में चुनौती, सरकार को नोटिस


जबलपुर, 15 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के पुनर्गठन और उसके बड़े हिस्से को अलग कर उज्जैन में नई मध्य प्रदेश धन्वंतरि विश्वविद्यालय स्थापित करने के राज्य सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

याचिकाकर्ताओं ने 21 अगस्त 2026 को राजपत्र में प्रकाशित संशोधन अधिनियम और मध्य प्रदेश धन्वंतरि विश्वविद्यालय अधिनियम, 2026 की वैधानिकता पर भी सवाल खड़े किए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रस्तावित पुनर्गठन से जबलपुर स्थित मौजूदा आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र, संसाधनों और संस्थागत क्षमता में बड़ा बदलाव होगा।

याचिका के अनुसार प्रस्तावित पुनर्गठन के बाद नई धन्वंतरि विश्वविद्यालय, उज्जैन के अधिकार क्षेत्र में छह संभाग, 31 जिले और प्रदेश के 80 में से 64 चिकित्सा महाविद्यालय शामिल हो जाएंगे। वहीं, मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के पास चार संभाग, 24 जिले और केवल 16 कॉलेज रह जाने का दावा किया गया है।

याचिकाकर्ता डॉ. पीजी नाजपांडे और रजत भार्गव ने इस व्यवस्था को असमान और भेदभावपूर्ण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के पुनर्गठन का स्वरूप ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे मौजूदा विश्वविद्यालय के बड़े पैमाने पर संसाधन और संस्थागत क्षमता अलग हो जाए।

याचिका में मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के करीब 250 करोड़ रुपए के रिजर्व फंड को नई प्रस्तावित धन्वंतरि विश्वविद्यालय में स्थानांतरित किए जाने पर भी आपत्ति दर्ज कराई गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब पुनर्गठन और संपत्तियों के हस्तांतरण की वैधानिकता स्वयं न्यायिक परीक्षण के अधीन है, तब रिजर्व फंड के हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जानी चाहिए।

याचिका में इस राशि के हस्तांतरण पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय की संपत्तियों, संसाधनों और अन्य वित्तीय मदों के विभाजन को लेकर भी न्यायालय के समक्ष गंभीर आपत्तियां रखी गई हैं।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इतने बड़े स्तर पर विश्वविद्यालय के पुनर्गठन का निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञों से पर्याप्त अध्ययन नहीं कराया गया। याचिका में व्यवहार्यता रिपोर्ट, विशेषज्ञ समिति की अनुशंसाओं और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के अभाव का उल्लेख करते हुए निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार को मंत्रिमंडल नोट, विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और निर्णय से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण अभिलेख न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश देने की मांग की है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के इस पुनर्गठन का सीधा असर विद्यार्थियों, चिकित्सा महाविद्यालयों, कर्मचारियों और विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ सकता है, इसलिए पूरे मामले की न्यायिक समीक्षा जरूरी है।

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब सरकार के जवाब और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों के आधार पर मामले की अगली सुनवाई और आगे की दिशा तय होगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / विलोक पाठक