home page

सागरः 3 साल तक आश्रम का 'राम' बनकर रहा मूक-बधिर बच्चा, अब 'रहीम' बनकर लौटेगा अपने परिवार के पास

 | 
सागरः 3 साल तक आश्रम का 'राम' बनकर रहा मूक-बधिर बच्चा, अब 'रहीम' बनकर लौटेगा अपने परिवार के पास


सागर, 12 जून (हि.स.)। कहते हैं कि मजहब, जाति और भाषा की दीवारें सिर्फ इंसानों के दिमाग में होती हैं, दिल में तो सिर्फ मोहब्बत और इंसानियत बसती है। इस बात को सच साबित कर दिखाया है मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित 'घरौंदा आश्रम' ने।

यहाँ कुछ ऐसी अनूठी और मार्मिक कहानी सामने आई है, जो आज के दौर में सांप्रदायिक सौहार्द और निस्वार्थ प्रेम की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है। लगभग तीन वर्षों से अपने परिवार से बिछड़ा एक मासूम बच्चा, जो इस आश्रम का 'राम' था, अब 'रहीम' बनकर अपने असली माता-पिता के पास लौटने को तैयार है।

आश्रम की संचालिका प्रीति यादव ने शुक्रवार को बताया कि यह पूरा मामला करीब तीन वर्ष पुराना है, जब सागर जिले में एक मूक-बधिर बालक लावारिस और बेहद दयनीय अवस्था में उन्हें मिला था। वह बच्चा न तो बोल सकता था और न ही सुन सकता था। ऐसे में वह अपना नाम, पता या अपने माता-पिता के बारे में कुछ भी बताने में पूरी तरह असमर्थ था। उसकी पहचान पूरी तरह से अज्ञात थी। उन्होंने इस बेसहारा बच्चे की उंगली थामी और उसे अपने आश्रम में आश्रय दिया। प्रीति यादव ने बिना किसी भेदभाव के उसे अपने सगे बच्चे की तरह पालन-पोषण शुरू किया।

पहचान न होने के कारण आश्रम प्रबंधन और वहाँ रहने वाले लोगों ने उस बच्चे को बेहद प्यार और आदर से 'राम' नाम दिया। बीते तीन सालों में 'राम' ने आश्रम के हर सदस्य के दिल में अपनी जगह बना ली। उसकी मासूमियत पर हर कोई अपना दिल हार बैठता था। इन तीन सालों में किसी ने भी उसकी जाति, धर्म या मूल पहचान को जानने की कोशिश नहीं की, बल्कि सभी ने उसे सिर्फ और सिर्फ बेइंतहा प्यार और ममता दी।

आश्रम प्रबंधन, स्थानीय पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार इस बच्चे के परिजनों को ढूंढने का प्रयास कर रहे थे। इंटरनेट से लेकर थानों के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे थे, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी। मगर सच कहा जाता है कि अगर उम्मीद सच्ची हो तो रास्ता मिल ही जाता है। लगातार किए गए अथक प्रयासों के बाद आखिरकार बच्चे के वास्तविक परिवार का सुराग मिल गया। पुलिस और आश्रम को पता चला कि यह बच्चा मूल रूप से गुजरात का रहने वाला है और इसका असली नाम 'रहीम' है। जैसे ही गुजरात में रह रहे उसके परिजनों से संपर्क किया गया, वर्षों से अपने कलेजे के टुकड़े को ढूंढ रहे माता-पिता के आंसू छलक पड़े। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब रहीम का परिवार उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत वापस अपने घर ले जाने के लिए सागर आएगा।

यह केवल एक गुमशुदा बच्चे के अपने परिवार से मिलने की खबर नहीं है, बल्कि यह इस देश के ताने-बाने और गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल है। तीन साल तक एक मुस्लिम बच्चे को 'राम' के रूप में वही लाड-प्यार मिला, जो एक सनातनी परिवार अपने बच्चे को देता है।

कागजी कार्रवाई पूर्ण होने पर 'राम' अपनी असली पहचान 'रहीम' के साथ अपने घर वापस लौटेगा। घरौंदा आश्रम की आँखें नम हैं, लेकिन दिल में इस बात का सुकून है कि एक मां को उसका खोया हुआ लाल मिल गया। यह कहानी पूरे समाज को संदेश देती है कि नाम बदल सकते हैं, मजहब जुदा हो सकते हैं, लेकिन ममता, दर्द और इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता। इंसानियत ही संसार का सबसे बड़ा और सच्चा धर्म है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुमार चौबे